भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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१५४) (श्री भक्तमाल शेषावति नृप के, पुरोहित की बेटी जानौ, वास हो खँड़ेला, करमैती सो बखानियै। बस्यौ उर स्याम, अभिराम कोटि काम हूँ ते, भूले धाम काम, सेवा मानसी पिछानियै।। बीत जात जाम, तन बाम अनुकूल भयौ, फूलि-फूलि अंग, गति मति छबि सानियै।। आयौ पति गौनो लैन, भायौ पितु-मातु हिये, लिये चित चाव पट आभरन आनियै।।५८४।। पर्यौ सोच भारी, कहा कीजिये विचारी, हाड़-चाम सौं सँवारी देह, रति के न काम की। तावें देवौ त्यागि, मन सोवै जनि जाग, अरे मिटै उर दाग, एक साँची प्रीति स्याम की।। लाज कौन काज, जोपै चाहै ब्रजराज सुत, बड़ोई अकाज जोपै, करै सुधि धाम की। जानी भोर गौनो होत, सानी अनुराग रंग, संग एक वही चली भीजी मति बाम की।।५८५।। आधी निसि निकसी यों, बसी हिये मूरति सो, पूरति सनेह तन, सुधि बिसराई है। भोर भये शोर पर्यौ, पर्यौ पितु-मातु सोच, करयौ लै जतन, ठौर-ठौर ढूँढि आई है।। चारो ओर दौरे नर, आये ढिंग डुरि जानि, ऊँट के करंक मध्य देह जा दुराई है। जग दुरगन्ध, कोऊ ऐसी बुरी लागी जामें, वह दुरगन्ध सो सुगन्ध-सी सुहाई है।।५८६।। बीते दिन तीन, वा कंरक ही में शंक नहीं, बंक प्रीति रीति, यह कैसें करि गाइयै। आयौ कोऊ संग, ताही संग, गंग तीर आई, तहाँ सो अन्हाई, दै भूषन वन आइयै।। ढूँढ़त परसराम, पिता मधुपुरी आये, पते ले बताये, जाय माथुर मिलाइयै। सघन विपिन, बह्मकुण्ड पर बर एक, चढ़ि करि देखी, भूमि अँसुवा भिजाइयै।।५८७।। उतरिकै आय, रोय पाँय लपटाय गयौ, कटी मेरी नाक, जग मुख न दिखाइयै। चलौ गृह वास करौ, लोक उपहास मिटै, सासु घर जावौ, मत सेवा चित लाइयै।। कोऊ सिंह व्याघ्र अजू, वपु कौ विनास करै, त्रास मेरे होत, फिरि मृतक जिवाइयै। बोली कही साँच, बिन भक्ति तन ऐसो जानौ, जोपै जियौ चाहौ, करौ प्रीति जस गाइयै।।५८८।। कही तुम कटी नाक, कटै जोपै होय कहूँ, नाक एक भक्ति, नाक लोक में न पाइयै। बरस पचास लगि, विषै ही में वास कियौ, तऊ न उदास भये, चबे को चबाइयै।। देखे सब भोग, मैं न देखे एक, देखे स्याम, तातें तजि काम, तन सेवा में लगाइयै। रात तें ज्यौं प्रात होत, ऐसे तम जात भयौ, दयौ लै सरूप, प्रभु गयौ हिये आइयै।।५८६।। आये निसि घर, हरिसेवा पधराय चाय, मन को लगाय, वही टहल सुहाई है। कहूँ जात आवत न, भावत मिलाप कहूँ, आप नृप पूछे, द्विज कहाँ? सुधि आई है।। बोल्यौ कोऊ जन, धाम स्याम संग पागे सुनि, अति अनुरागे वेगि, खबर मँगाई है। कहौ तुम जाय, ईश इहाँई असीस करौं, कही भूप आयौ हिये, चाह उपजाई है।।५६०।।