श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६) (श्री भक्तमाल जोगानन्द उजागर वंश, करि निसिदिन हरिगुन गावनौ। हरिदास भलप्पन भजनबल, बावन ज्यों बढ़यौ बावनौ ॥१३६॥ श्रीपरशुरामजी जंगली देश के लोग सब, श्रीपरशुराम किय पारषद॥ ज्यों चन्दन कौ पवन, नीम्ब पुनि चन्दन करई। बहुत काल तम निबिड़, उदै दीपक ज्यों हरई॥ श्रीभट पुनि हरिव्यास, सन्त मारग अनुसरई। कथा कीरतन नेम, रसन हरिगुन उच्चरई॥ गोविन्द भक्ति गद रोग गति, तिलक दाम सद्वैद हद। जंगली देश के लोग सब, श्रीपरशुराम किय पारषद ॥१३७॥ राजसी महन्त देखि, गयौ कोऊ अन्त लैन, बोल्यौ जू अनन्त, हरि सगे माया टारियै। चले संग वाके, त्यागि पहिरि कुपीन अंग, बैठे गिरि कन्दरा में, लागी ठौर प्यारियै॥ तहाँ बनिजारौ आय, सम्पति चढ़ाय दई, दई और पालकी हूँ, महिमा निहारियै। जाय लपटायौ पाँय, भाव मैं न जान्यौ कछू, आन्यौ उर माँझ, आवै प्रान वारि डारियै॥५२२॥ मास परायण चौबीसवाँ विश्राम नवाह परायण सप्तम विश्राम श्रीगदाधरभट्टजी गुननिकर गदाधरभट्ट अति, सबहिन कौ लागै सुखद॥ सज्जन सुहृद् सुशील, वचन आरज प्रतिपालय। निर्मत्सर निहकाम, कृपा करुणा कौ आलय॥ अनन्य भजन दृढ़ करनि, धर्यौ वपु भक्तनि काजै। परम धरम कौ सेतु, विदित वृन्दावन गाजै॥ भागौत सुधा बरषै वदन, काहू कौं नाहिन दुखद। गुननिकर गदाधरभट्ट अति, सबहिन कौ लागै सुखद ॥१३८॥