भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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६६) (श्री भक्तमाल) हित जू की रीति कोऊ लाखनि में एक जानै, राधा ही प्रधान मानै पाछे कृष्ण ध्याइयै। निपट विकट भाव होत न सुभाव ऐसो, उनहीं की कृपादृष्टि नेकु क्यौं हूँ पाइयै।। विधि औ निषेध छेद डारे प्रान प्यारे हिये, जिये निज दास निसिदिन वहै गाइयै। सुखद चरित्र सब रसिक विचित्रन के, जानत प्रसिद्ध कहा कहिकै सुनाइयै॥ ३६४॥ आये घर त्याग राग बढ़यौ प्रिया-प्रियतम सौं, विप्र बड़भाग हरि ओझा दई जानियै। तेरी उभै सुता ब्याहि देवौ लेवौ नाम मेरौ, इनकौ जो वंस सो प्रशंस जग मानियै।। ताही द्वार सेवा विस्तार निज भक्तन की, अगतिन गति सो प्रसिद्ध पहिचानियै। मानि प्रिय बात ग्रहगयौ सुख लह्यौ तब, कह्यौ कैसे जात यह मन, मन आनियै॥ ३६५॥ राधिकावल्लभ लाल आज्ञा सो रसाल दई, सेवा मो प्रकास औ विलास कुंज धाम कौ। सोई विस्तार सुखसार दृग रूप पियौ, दियौ रसिकानि जिन लियौ पच्छ बाम कौ।। निसिदिन गान रस माधुरी कौ पान उर, अन्तर सिहान एक काम स्यामा-स्याम कौ। गुन सो अनूप कहि कैसे कै सरूप कहै, लहै मनमोद जैसे और नहीं नाम कौ॥ ३६६॥ स्वामी श्रीहरिदासजी (श्री) आसुधीर उद्योतकर, रसिक छाप हरिदास की।। जुगल नाम सौं नेम, जपत नित कुंजविहारी। अवलोकत रहैं केलि, सखी सुख के अधिकारी।। गान कला गन्धर्व, स्याम-स्यामा कौं तोषैं। उत्तम भोग लगाय, मोर मरकट तिमि पोषैं।। नृपति द्वार ठाढ़े रहैं, दरसन आसा जास की। (श्री) आसुधीर उद्योतकर, रसिक छाप हरिदास की॥६१॥ स्वामी हरिदास रसरासि को बखान सकै, रसिकता छाप जोई जाप मधि पाइयै। ल्यायो कोऊ चोवा वाकौ अति मन भोवा वामें, डार्यौ लै पुलिन यह खोवा हिये आइयै।। जानिकै सुजान कही 'लै दिखावौ लाल प्यारे', नैसुकु उघारे पट सुगंध बुड़ाइयै। पारस पाषान करि जल डरवाय दियौ, कियौ तब शिष्य ऐसे नाना विधि गाइयै॥ ३६७॥ मास परायण सोलहवाँ विश्राम