श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीहरिराम व्यासजी) (६७
श्रीहरिराम व्यासजी
उतकर्ष तिलक अरु दाम को, भक्त इष्ट अति व्यास के। काहू के आराध्य मच्छ, कच्छ नरहरि सूकर। वामन परसाधरन, सेतबन्धन जु सैलकर॥ एकन कें यह रीति, नेम नवधा सौं लाये। सुकुल सुमोखन सुवन, अच्युत गोत्री जु लड़ाये॥ नौगुण तोरि नूपुर गुह्यौ, महत सभा मधि रास के। उत्कर्ष तिलक अरु दाम कौ भक्त इष्ट अति व्यास के।।६२।।
आये गृह त्यागि वृन्दावन अनुराग करि, गयौ हियौ पागि होय न्यारो तासौं खीजियै। राजा लैन आयो ऐपै जायवौ न भायो, श्रीकिशोर उरझायौ मन सेवा मति भीजियै।। चीरा जरकसी सीस चीकनौ खिसिलि जाय, 'लेहु जू बँधाय नहीं आप बाँध लीजिये'। गये उठि कुंज सुधि आई सुखपुंज आये, देख्यौ बँध्यौ मंजु कही कैसे मोपै रीझियै।।३६८।।
सन्त सुखदैन बैठे संग ही प्रसाद लेन, परोसति तिया सब भाँतिन प्रवीन है। दूध बरताई लै मलाई छिटकाई निज, खीझि उठे जानि पति पोषति नवीन है।। सेवा सौं छुटाय दई अति अनमनी भई, गई भूख बीते दिन तीन तन छीन है। सब समझावैं तब दण्ड को मनावैं अँग, आभरन बेंच साधु जेंवैं यों अधीन हैं।। ३६९।।
सुता कौ विवाह भयौ बड़ौ उतसाह कियौ, नाना पकवान सब नीके बनि आये हैं। भक्तनि की सुधि करी खरी अरबरी मति, भावना करत भोग सुखद लगाये है।। आय गये साधु सो बुलाय कही पावौ जाय, पोटनि बँधाय चाय कुंजनि पठाये है। वंसी पहिराई द्विज भक्ति लै दृढ़ाई सन्त, सम्पुट में चिरिया दै हित सौं बसाये हैं।। ३७० ।।
शरद उज्यारी रास रच्यौ पिया प्यारी तामें, रंग बढ़्यौ भारी कैसे कहिकै सुनाइयै। प्रिया अति गति लई बिजुरी-सी कौंधि गई, चकचौंधी भई छबि मण्डल में छाइयै।। नूपुर सी टूटि छूटि पर्यौ अरबर्यौ मन, तोरिकै जनेऊ कर्यौ वाही भाँति भाइयै। सकल समाज में यों कह्यौ 'आज काम आयौ, ढोयो हौं जनम' ताकी बात जिय आइयै।।३७१।।
गायौ भक्त इष्ट अति सुनिकै महन्त एक, लैन कौं परीक्ष्या आयौ संग सन्त भीर है। भूख कौं जतावै वानी व्यास कौ सुनावै सुनि, कही भोग आवै इहाँ मानै हरि धीर है।।