भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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६८) (श्री भक्तमाल तब न प्रमान करी शंक धरी लै प्रसाद, ग्रास दोय चार उठे मानौं भई पीर है। पातरि समेटि लई सीत करि मोकौं दई, पावै तुम और पाँव लिये दृग नीर है।। ३७२।। भये सुत तीन बाँट निपट नवीन कियौ, एक ओर सेवा एक ओर धन धर्यौ है। तीसरी जु ठौर श्यामवन्दनी और छाप धरी, करी ऐसी रीति देखि बड़ौ सोच पर्यौ है।। एक ने रुपैया लिये एक ने किशोर जू कौं, श्रीकिशोरदास भाल तिलक लै कर्यौ है। छापे दिये स्वामी हरिदास निसि रास कीनौ, वही रास ललितादि गायो मन हर्यौ है।। ३७३।। श्रीजीव गोसाँईजी (श्री) रूप सनातन भक्तिजल, जीवगुसाँई सर गँभीर।। बेला भजन सुपक्व, कषाय न कबहुँ लागी। वृन्दावन दृढ़वास, जुगल चरननि अनुरागी।। पोथी लेखन पान, अंघट अक्षर चित दीनौ। सद्ग्रन्थनि कौ सार, सबै हस्तामल दीनौ। सन्देह ग्रन्थि छेदन समर्थ, रस रास उपासक परम धीर। (श्री) रूप सनातन भक्तिजल जीवगुसाँई सर गँभीर ।।६३।। किये नाना ग्रन्थ हृदै ग्रन्थि दृढ़ छेदि डारैं, डारैं धन यमुना में आवै चहुँओर तें। कही दास 'साधुसेवा कीजै' कहैं 'पात्रता न', करौं नीके करी बोल्यौ कटु कोप जोर तें।। तब समझायौ सन्त गौरव बढ़ायौ यह, सबकों सिखायौ बोलौ मीठौ निसि भोर तें। चरित अपार भाव-भक्ति कौ न पारावार, कियोऊ वैराग सार कहै कौन छोर तें ।। ३७४ ।। श्रीवृन्दावनवासी भक्त वृन्दावन की माधुरी, इन मिलि आस्वादन कियौ।। सर्वसु राधारमन, भट्ट गोपाल उजागर। हृषीकेश भगवान, विपुलबीठल रससागर।। थानेश्वरी जगन्नाथ, लोकनाथ महामुनि मधु श्रीरंग। कृष्णदास पण्डित, उभै अधिकारी हरि अंग।।

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