श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीलोकनाथ गोसाँईजी) (६६ घमण्डी युगलकिशोर भृत्य, भूगर्भ जीव दृढ़व्रत लियौ। वृन्दावन की माधुरी इन मिलि आस्वादन कियौ॥६४॥ श्रीगोपालभट्ट गोसाँईजी श्रीगोपाल भट्ट जू के हिये वै रसाल बसे, लसे यों प्रगट राधारवन सरूप हैं। नाना भोग राग करैं अति अनुराग पगे, जगे जग माहिं हित कौतुक अनूप हैं॥ वृन्दावन माधुरी अगाध कौ सवाद लियौ, जियौ जिन पायौ सीथ भये रस रूप हैं। गुन ही कौ लेत जीव अवगुन को त्यागि देत, करुनानिकेत धर्मसेत भक्तभूप हैं॥३७५॥ श्रीअलि भगवान् अलि भगवान रामसेवा सावधान मन, वृन्दावन आये कछु औरै रीति भई है। देखे रासमण्डल में विहरत रस रास, बाढ़ी छबि प्यास दृग सुधि-बुधि गई है॥ नाम धरि रास औ विहारी सेवा प्यारी लागी, खगी हिय माँझ गुरु सुनी बात नई है। विपिन पधारे आप जाय जग धारे सीस, 'ईश मेरे तुम' सुख पायौ कहि दई है॥३७६॥ नवाह परायण पंचम विश्राम श्रीबीठलविपुलजी स्वामी हरिदास जू के दास नाम बीठल है, गुरु के वियोग दाह उपज्यौ अपार है। रास के समाज में विराज सब भक्तराज, बोलिकै पठाये आये आज्ञा बड़ी भार है॥ युगल सरूप अवलोकि नाना नृत्य भेद, गान तान कान सुनि रही न सँभार है। मिलि गये वाही ठौर पायौ भाव तन और, कह्यौ रससागर सो ताकौं यों विचार है॥३७७॥ श्रीजगन्नाथजी थानेश्वरी महाप्रभु पारषद थानेश्वरी जगन्नाथ, नाथ कौ प्रकास घर दिना तीनि देख्यो है। भये शिष्य जान आप नाम कृष्णदास धर्यौ, कृष्ण जू कहत सबै आदर बिसेख्यो है॥ सेवा मनमोहन जू कूप में जनाइ दई, बाहर निकालि करी लाड़ उर लेख्यो है। सुत रघुनाथ जू कौं स्वप्न में श्लोक दान, दया के निधान पुत्र दियौ प्रेम पेख्यो है॥३७८॥ श्रीलोकनाथ गोसाँईजी महाप्रभु कृष्णचैतन्य जू के पारषद, लोकनाथ नाम अभिराम सब रीति है। राधाकृष्ण लीला सौं रंगीन में नवीन मन, जैसे जल मीन तैसें निसि दिन प्रीति है॥ भागवत गान रसखान सो तौ प्रान तुल्य, अति सुख मान कहैं गावै जोई मीति है। रसिक प्रवीन मग चलत चरन लागि, कृपा कै जताय दई जैसी नेह नीति है॥३७६॥