श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१००) (श्री भक्तमाल श्रीमधु गोसाँईजी श्रीमधुगोसाँई आये वृन्दावन चाह बढ़ी, देखें इन नैननि सौं कैसो धौं सरूप है। ढूँढ़त-फिरत वन-वन कुजलता द्रुम, मिटी भूख-प्यास नहीं जानैं छाँह धूप है।। जमुना चढ़त काट करत करारे जहाँ, वंसीवट तट डीठ परे वे अनूप है। अँक भरि लिये दौर अजहूँ लौं सिरमौर, चाहै भाग भाल साथ गोपीनाथ रूप है।। ३८०।। श्रीकृष्णदासजी ब्रह्मचारी गुसाँईं श्रीसनातन जू मदनमोहन रूप, माथैं पधराये कही 'सेवा नीके कीजियै'। जानौं कृष्णदास ब्रह्मचारी अधिकारी भये, भट्ट श्रीनारायण जू शिष्य किये रीझियै।। करिकै सिंगार चारु आप ही निहारि रहैं, गहैं नहीं चेत भाव माँझ मति भीजियै। कहाँ लौं बखान करौं राग भोग रीति भाँति, अबलौं विराजमान देखि-देखि जीजियै।। ३८१।। श्रीकृष्णदासजी पण्डित श्रीगोविन्दचन्द रूपरासि रसरासि दास, कृष्णदास पण्डित ये दूसरे यों जानि लै। सेवा अनुराग अंग-अंग मति पागि रही, पागि रही मति जोपै तोपै यह मानि लै।। प्रीति हरिदासन सौं विविध प्रसाद देत, हिये लाय लेत देखि पद्धति प्रमानि लै। सहज की रीति में प्रतीति सो विनीत करें, ढरै वाही ओर मन अनुभव आनि लै।। ३८२।। श्रीभूगर्भ गोसाँईजी गुसाँईं भूगर्भ वृन्दावन दृढ़ वास कियौ, लियौ सुख बैठि कुंज गोविन्द अनूप हैं। बड़ेई विरक्त अनुरक्त रूपमाधुरी में, ताही को सवाद लेत मिले भक्तभूप हैं।। मानसी विचार ही अहार सौं निहारि रहैं, गहैं मनवृत्ति वेई युगल सरूप हैं। बुद्धि के प्रमान उनमान में बखान कर्यो, भर्यौ बहुरंग जाहि जानै रसरूप हैं।। ३८३।। श्री रसिकमुरारिजी (श्री) रसिकमुरारि उदार अति मत्त गजहिं उपदेश दियौ।। तन मन धन परिवार सहित सेवत सन्तन कहँ। दिव्य भोग आरती अधिक हरिहूँ ते हिय महँ।। श्रीवृन्दावनचन्द स्याम - स्यामा रँग भीने। मगन प्रेम पीयूष पयध परचै बहु दीने।।