भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्री रसिकमुरारि जी) (१०१ श्रीहरिप्रिय श्यामानन्दवर भजन भूमि उद्धार कियौ। (श्री) रसिकमुरारि उदार अति मत्त गजहिं उपदेश दियौ।। ६५।। रसिकमुरारि साधुसेवा विसतार कियो, पावै कौन पार, रीति भाँति कछु न्यारियै। सन्त चरनामृत के माट गृह भरे रहें, ताही कौ प्रनाम पूजा, करि उर धारियै।। आवैं हरिदास, तिन्हें देत सुखरासि, जीभ एक न प्रकासि सकै, थकै सो विचारियै। करैं गुरु उत्सव लै, दिन मान सबै कोऊ द्वादस दिवस जन घटा लागी प्यारियै।। ३८४।। सन्त चरनामृत कौं ल्यावो जाय नीकी भाँति, जीय की भाँति जानिवे को दास लै पठायौ है। आनिकै बखान कियौ, लियो सब साधुन कौ, पान करि बोले, सो सवाद नहीं आयौ है।। जिते सभाजन कही, चाखौ देहु मन कोऊ महिमा न जानै कन जानी छोड़ि आयौ है। पूछी कही कोढ़ी एक रह्यौ, आनो, ल्यायो, पीयो, दियो सुख पाय नैन नीर ढरकायौ है।। ३८५।। नृपति समाज में विराजमान भक्तराज, कहैं वे विवेक कोऊ कहनि प्रभाव है। तहाँ एक ठौर, साधु भोजन करत रौर, देवो दूजी सोंटा संग, कैसे आवै भाव है।। पातरि उठाय श्रीगुसाँई पर डारि दई, दई गारी सुनी आप, बोले देखो दाव है। सीथ सौं विमुख मैं तो, आनि मुख मध्य दियो, कियो दास दूर, सन्तसेवा में न चाव है।। ३८६।। बाग में समाज सन्त, चले आप देखिवें को, देखत दुरायौ जन हुक्का सोच पर्यो है। बड़ौ अपराध मानि, साधु सनमान चाहें, घूमितन बैठि कही देखौ कहूँ धर्यो है।। जायकै सुनाई दास, काहू के तमाखू पास, सुनिकै हुलास बढ़्यौ, आगैं आनि कर्यो है। झूठे ही उसांस भरि, साँचे प्रेम पाय लिये, किये मनभाये ऐसे, शंका दुख हर्यो है।। ३८७।। उपजत अन्न गाँव, आवै साधुसेवा ठांव, नयौ नृप दुष्ट, आय कांव-कांव कियौ है। ग्राम सो जबत कर्यो, कर्यो लै विचार आप, स्यामानन्द जू मुरारि पत्र लिखि दियौ है। जाही भाँति होहु, ताही भाँति उठि आवौ इहाँ, आये हाथ बाँधि करि अँचैहू न लियौ है। पाछे साष्टांग करी, करी लै निवेदन सो भोजन में कही चलि आयो भीज्यौ हियौ है।। ३८८।। आज्ञा पाय अँचयौ लै, दै पठाये वाही ठौर, दुष्ट सिरमौर जहाँ, तहाँ आप आये हैं। मिले मुतसद्दी शिष्य, आइकै सुनाई बात, जावौ उठि प्रात, यह नीच जैसे गाये हैं।। हमही पठावैं, काम करि समझावैं सब, मन में न आवै, जानी नेह डर पाये है। चिन्ता जिनि करौ, हिये धरौ निहचिन्तताई, भूप सुधि आई, दिना तीन कहाँ छाये है।। ३८६।।