भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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सुनी आये गुरुवर, कही ल्यावो मेरे घर, देखें करामात, बात यह लै सुनाई है। कह्यौ आनि अभूँ जावौ चलौ उनमान देखें, चले सुख मानि आयौ हाथी धूम छाई है। छोड़िकै कहार भाजि गये न निहारि सके, आप रससार वानी बोले, जैसी गाई है। बोलौ हरे कृष्ण-कृष्ण, छाड़ौ गज तम तन, सनि गयौ हिये भाव, देह सो नवाई है॥३६०॥ बहै दृह नीर, देखि ह्वै गयौ अधीर, आप कृपा करि शिष्य कियौ, दियौ भक्तिभाव है। कान में सुनायौ नाम, नाम दै गुपालदास, माल पहिराई गरें, प्रगट्यौ प्रभाव है॥ दुष्ट सिरमौर भूप, लखि उहिं ठौर आयौ, पाँय लपटायौ, भयौ हिये अति चाव है। निपट अधीन, गाँव केतिक नवीन दिये, लिये कर जोरि, मेरौ फल्यो भाग दाव है॥३६१॥ भयौ गजराज, भक्तराज साधुसेवा साज, सन्तनि समाज देखि, करत प्रनाम है। आनि डारै गोनि, बनजारनि की बारन सौं, आयेई पुकारन वे जहाँ, गुरू धाम है॥ आवत महोच्छौ मध्य, पावत प्रसाद सीथ, बोले आप हाथी सौं यों, निंद्य वह काम है। छोड़ि दई रीति तब, भक्तन सौं प्रीति बढ़ी, संग ही समूह फिरै, फैलि गयो नाम है॥३६२॥ सन्त सत पाँच, सात, संग जित जात तित, लोग उठि धावैं, ल्यावैं सीधे बहु भीर है। चहुँदिसि परी हई सूबा सुनि चाह भई हाथ पै न आवत सो आनै कोऊ धीर है॥ साधु एक गयौ, गही लयौ भेष दास तन, मन में प्रसाद, नेम पीवै नहीं नीर है। बीते दिन तीन चारि, जल लै पियावैं धारि, गंगा जू निहारि मधि, तज्यौ यों सरीर है॥३६३॥ सप्ताह परायण चौथा विश्राम मास परायण सत्रहवाँ विश्राम भव प्रवाह निस्तार हित अवलम्बन ये जन भये॥ सोझा सींवा अधार धीर हरिनाभ त्रिलोचन। आसाधर घौराजनीर सधना दुखमोचन॥ काशीश्वर अवधूत कृष्ण किंकर कटहरिया। सोभू ऊदाराम नाम डूँगर व्रत धरिया॥ पदम पदारथ रामदास विमलानन्द अमृतश्रये। भव प्रवाह निस्तार हित अवलम्बन ये जन भये॥ ६६॥ श्रीसदन (सधनजी) सदना कसाई, ताकी नीकी कस आई, जैसे बाराबानी सोने की, कसौटी कस आई है। जीव को न बध करैं, ऐपै कुलाचार ढरै, बेंचै मांस लाय, प्रीति हरि सौं लगाई है॥