भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीकलिकल्पवृक्ष भक्त) (१०३ गण्डकी कौ सुत, बिन जाने तासो तौल्यौ करै, भरै दृग साधु, आनि पूजे पै न भाई है। कही निसि सपने में, वाही ठौर मोकौं देवौ, सुनौं गुनगान रीझौ, हिय की सचाई है।। ३६४।। लैके आयौ साधु, मैं तौ बड़ौ अपराध कियौ, कियौ अभिषेक सेवा करी पै न भाई है। ए तौ प्रभु रीझे तोपै, जोई चाहौ सोई करौ, गरो भरि आयौ, सुनि मति बिसराई है।। वेई हरि उर धारि, डारि दियौ कुलाचार, चले जगन्नाथदेव, चाह उपजाई है। मिल्यौ एक, संग-संग जात वे सुगात सब, तब आप दूर-दूर रहैं जानि पाई है।। ३६५।। आयौ मग गाँव, भिक्षा लेन इक ठांव गयौ, नयो रूप देखि, कोऊ तिया रीझि परी है। बैठौ याही ठौर, करौ भोजन निहोरि कह्यौ, रह्यौ निसि सोय, आई मेरी मति हरी है।। लेवो मोकौं संग, गरौ काटौ तौ न होय रंग, बूझी और काटी पति ग्रीव, पै न डरी है। कही अब पागो मोसौँ, नातौ कौन तोसौँ मोसौँ शोर करि उठी इन मार्यौ भीर करी है।। ३६६।। हाकिम पकरि पूछे, कहै हँसि मार्यौ हम, डार्यौ सोच भारी, कही हाथ काटि डारियै। कट्यौ कर, चले हरि रंग माँझ झिले मानी जानी कछु चूक मेरी यहै उर धारियै।। जगन्नाथदेव आगे, पालकी पठाई लेन, सधना सो भक्त कहाँ? चढैं न विचारियै। चढ़ि आये प्रभु पास, सपनो सो मिट्यो त्रास, बोले दै कसौटी हूँ पै भक्ति बिसतारियै।। ३६७।। श्रीकाशीश्वर गोसाँईजी श्रीगुसाँई काशीश्वर, आगे अवधूत वर, करि प्रीति नीलाचल, रहे लाग्यो नीको है। महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य जू की आज्ञा पाय, आये वृन्दावन, देखि भायौ भयौ हीको है।। सेवा अधिकार पायौ, रसिक गोविन्दचन्द, चाहत मुखारविन्द, जीवनि जो जीको है। नित ही लड़ायैं, भवसागर बुड़ायैं, कौन पारावार पावै, सुनैं लागैं, जग फीको है।। ३६८।। श्रीकलिकल्पवृक्ष भक्तजी करुना छाया भक्तिफल ए कलिजुग पादप रचे।। जतीरामरावल्लि श्यामखोज़ी सन्त सीहा। दलहा पद्म मनोरथ राँका घौगू जपजीहा।। जाड़ा चाचागुरू सवाई चाँदा नापा। पुरूषोत्तम सौँ साँच चतुर कीता (मनकौ) जिहि मेट्यौ आपा।।