श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगम्भीरे अर्जुन जनार्दन गोविन्द जीता। दामोदर साँपिले गदा ईश्वर हेमविदीता॥ मयानन्द महिमा अनन्त, गुढीले तुलसीदास। हरि के सम्मत जे, भगत, ते दासनि के दास॥१०५॥ श्रीनरबाहनजी रहैं भौगाँव नांव नरबाहन साधुसेवी, लूटि लई नाव, जाकी बन्दीखानै दियौ है। लौंड़ी आवै दैन कछू, खायवे को, आई दया, अति अकुलाई लै, उपाय यह कियौ है॥ बोलौ राधवल्लभ औ, लेवौ हरिवंश नाम, पूछै शिष्य नाम कहौ, पूछी नाम लियौ है। दई मँगवाय वस्तु, राखियो दुराय बात, आय दास भयौ, कही रीझि पद दियौ है॥४१६॥ श्रीमुख पूजा सन्त की, आपुन तें अधिकी कही॥ यहै वचन परमान, दास गाँवरी जटीयाने भाऊ। बूँदी बनियाँ राम, मँड़ौते मोहनवारी दाऊ॥ माड़ौठी जगदीसदास, लछमन चट्टूथावल भारी। सुनपथ में भगवान, सबै सलखान गुपाल उधारी॥ जोबनेर गोपाल के, भक्त इष्टा निर्वही। श्रीमुख पूजा सन्त की, आपुन तें अधिकी कही॥१०६॥ श्रीगोपालदास जोबनेरी जोबनेर वास, सो गोपाल भक्त-इष्ट ताकौं, कियौ निर्वाह बात, मोकौं लागी प्यारियै। भयौ हो विरक्त कोऊ कुल में प्रसंग सुन्यौ, आयौ यों परीच्छा लैन, द्वार पै विचारियै॥ आय पर्यौ पाँय, पाँय धारौ निज मन्दिर में, सुन्दरी न देखौं मुख, पन कैसे टारियै। चलो जिन टारौ तिया, रहैंगी किनारौ करि, चले सब छिपीं नेकु, देखी याकै मारियै॥४२०॥ एक पै तमाचो दियौ, दूसरे ने रोष कियौ, देवौ या कपोल पै यों, वानी कही प्यारी है। सुनि आँसू भरि आये, जाय लपटाये पाँय, कैसे कही जाय, यह रीति कछु न्यारी है॥ भक्त इष्ट सुन्यौ मेरे, बड़ौ अचरज भयौ, लई मैं परीच्छा, भई सिच्छ मोकौं भारी है। बोल्यौ अकुलाय, अजू पैयै कहाँ भाय ऐपै, साधु सुख पाय कहैं, यही मेरी ज्यारी है॥४२१॥