भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीलाखाजी) (१११ श्रीलाखाजी परमहंस वंशानि में, भयौ विभागी बानरौ॥ मुरधरखण्ड निवास, भूप सब आज्ञाकारी। राम-नाम विश्वास, भक्त पद रज व्रतधारी। जगन्नाथ के द्वार, दँडौतनि प्रभु पै धायौ। दई दास की दादि, हुण्डी करि फेरि पठायौ॥ सुरधुनी ओघ संसर्ग तैं, नाम बदल कुच्छित नरौ। परमहंस वंशानि में, भयौ विभागी बानरौ॥१०७॥ लाखा नाम भक्त, वाकौ बानरौ बखान कियौ, कहै, जग डूब, जासौ मेरो सिरमौर है। करैं साधुसेवा बहु, पाक डारि मेवा, सन्त जेंवत अनन्त, सुख पावै कौर-कौर है॥ ऐसे में अकाल पर्यौ, आवैं धरि माल-जाल, कैसे प्रतिपाल करैं, ताकी और ठौर है। प्रभु जू स्वपन दियौ, कियौं में जतन एक, गाड़ी भरि गेहूँ भैंसि, आवै करौ गौर है॥४२२॥ गेहूँ कोठी डारि मुँह, मूँदि नीचे देवो खोलि, निकसै अतोल, पीसि रोटी लै बनाइयै। दूध जितौ होय, सो जमायके विलोय लीजै, दीजै यों चुपिरि संग, छाछ दै जिंवाइयै॥ खुलि गई आँखें, भाखैं तिया सौं जु आज्ञा दई, भई मनभाई, अजू हरिगुन गाइयै। भोर भयैं गाड़ी भैंसि, आई वही रीति करी, करी साधुसेवा नाना भाँतिन रिझाइयै॥४२३॥ आई कौन रीति, वाकी प्रीतिहूँ बखान कीजै, लीजै उरधारि, सार भक्ति निरधार है। रहै ढिंग गाँव, तहाँ सभा एक ठाव भई, टूटि गयौ भाई, सो उगाही कौ विचार है॥ बोलि उठ्यौ कोऊ, यों व्यौहार को तौ भार चुक्यौ, लीजियै सँभारि लाखा सन्त भवपार है।। लाज दबि तिन दिये, गेहूँ लै पचास मन, दई निज भैंसि सग सब सरदार है॥४२४॥ मारबाड़ देस तैं, चल्यौई साष्टांग किये, हिये जगन्नाथदेव, याही पन जाइयै। नेह भरि भारी, देह वारि फेरि डारी, कैसें करै तनधारी, नेकु श्रम मुरझाइयै॥ पहुँचौ निकट जाय, पालकी पठाइ दई, कहैं लाखा भक्त कौन? वेगि दै बताइयै। काहू कहि दियौ, जाय कर गहि लियौ, अजू! चलौ प्रभु पास इहि छिनहिं बुलाइयै॥४२५॥ कैसे चढौं पालकी में?, पन प्रतिपाल कीजै, दीजै मोकौं दान, यही भाँति जा निहारियै। बोले प्रभु कही यों, सुमिरनी बनाय ल्याये, अब पहिराय मोहिं सुनि उर धारियै॥