श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२) (श्री भक्तमाल) चले चढ़ि-बढ़ि, कियौ चाहैं यह जानी मैं तौ, पढ़ि-पढ़ि पोथी प्रेम मोपै बिसतारियै। जायकै निहारे, तन मन प्रान वारे, जगन्नाथ जू के प्यारे, नेकु ढिंग तें न टारियै।।४२६।। बेटी एक क्याँरी, ब्याहि देत न विचारी, मन, धन हरि साधुनि कौ, कैसे कै लगाइयै। कीजै वाकौ काज कही, जगन्नाथदेव जू ने, लीजै मोपै द्रव्य, उर नेकहूँ न आइयै।। विदा पै न भये, चले, दृग भरि लये गये, आगे नृप भक्त, मग चौकी अटकाइयै। दियौ है सुपन प्रभु, जिनि हठ करौ आजू, हुण्डी लिखि दई लई, बिनै कै जताइयै।।४२७।। हुण्डी सो हजार की यों, लैकै गृहद्वार आये, तामें ते लगायौ सौक, बेटी ब्याह कियौ है। और सब सन्तनि, बुलायकैँ खवाय दिये, लिये पग दास, सुखरासि पन लियौ है।। ऐसें ही बहुत दाम, वाही के निमित्त लै-लै, सन्त भुगताये अति हरषित हियौ है। चरित अपार, कछु मति अनुसार कह्यौ, लह्यौ जिन स्वाद, सो तौ पाय निधि जियौ है।।४२८।। मास परायण उन्नीसवाँ विश्राम श्रीनरसीजी जगत् विदित नरसी भगत, (जिन) गुज्जर धर पावन करी। महास्मारत लोग, भक्ति लौलेश न जानैं। माला मुद्रा देखि, तासु की निन्दा ठानैं।। ऐसे कुल उत्पन्न, भयौ भागौत सिरोमनि। ऊसर तें सर कियौ, खण्डदोषहिं खोयो जिनि।। बहुत ठौर परचै दियौ, रसरीति भक्ति हिरदै धरी। जगत् विदित नरसी भगत, (जिन) गुज्जर धर पावन करी।।१०८।। जूनागढ़ वास, पिता-माता तन नास भयौ, रहै एक भाई, औ भौजाई रिस भरी है। डोलत-फिरत आय, बोलत पियावौ नीर, भाभी पै न जानी पीर, बोली जरीबरी है।। आवत कमाये जल, प्याये बिन सरै कैसे?, पियौ यों जवाब दियौ, देह थरथरी है। निकसे विचारि कहूँ, दीजै तन डारि मानौ, शिव पै पुकार करी, रहे चित धरी है।।४२६।। बीते दिन सात, शिव धाम तें न जात, बार, परै काहू तुच्छ द्वार, सोऊ सुधि लेत है। इतनी विचारि, भूख-प्यास दई टारि, लियौ प्रगट सरूप धारि, भयौ हिये हेत है।। बोले वर माँग आजू, माँगिवौ न जानत हौं, तुम्हें जोई प्यारौ, सोई देवो चितचेत है। पर्यो सोच भारी, मेरी प्रान-प्यारी नारी, तासौं कहत डरत वेद, कहै नेति-नेति है।।४३०।।