श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीगोविन्दस्वामीजी) (१०७ पण्डा गोपीनाथ, मुकुन्दा, गजपति महाजस। गुननिधि जस गोपाल, देइ भक्तनि कौ सरबस॥ श्रीअंग सदा सानिधि रहें, कृत पुण्यपुंज भल भाग भर। बद्रीनाथ उड़ीसे द्वारका, सेवक सब हरिभजन पर ॥१०१॥ श्रीरुद्रप्रताप गजपतिजी श्रीप्रतापरुद्र, गजपति कौ बखान कियौ, लियौ भक्तिभाव, महाप्रभु पै न देखहीं। कियेहूँ उपाय कोटि, ओटि लै संन्यास लियौ, हियौ अकुलायौ, अहो! किहूँ मोको पेखहीं॥ जगन्नाथ रथ आगे, नृत्य करैं मत्त भये, नीलाचल नृप पाँय पर्यौ भाग लेखहीं। छाती सौं लगायौ, प्रेमसागर बुड़ायौ भयौ, अति मन भायौ, दुख देत ये निमेखहीं॥४०६॥ श्रीहरिसुयश प्रचारक भक्तजी हरि सुजस प्रचुर कर जगत् में, ये कविजन अतिसय उदार॥ विद्यापति ब्रह्मदास, बहोरन चतुरविहारी। गोविन्द गंगा रामलाल बरसानियाँ मंगलकारी॥ प्रियदयाल परसराम, भक्त भाई खाटी कौ। नन्दसुवन की छाप, कवित केशव कौ नीकौ॥ आसकरन पूरन नृपति, भीषम जनदयाल गुन नहिन पार। हरि सुजस प्रचुर कर जगत् में, ये कविजन अतिसय उदार। १०२। श्रीगोविन्दस्वामीजी गोवर्द्धननाथ साथ, खेलैं सदा झेलैं रंग, अंग सख्यभाव, हिये गोविन्द सुनाम है। स्वामी करि ख्यात, ताकी बात सुनि लीजै नीके, सुने सरसात नैन, रीति अभिराम है॥ खेलत हो लाल संग, गयौ उठि दाँव लैके, मारी खैंचि गिल्ली, देखि मन्दिर में स्याम है। मानि अपराध साधु, धक्का दै निकारि दियो, मति सो अगाध कैसे, जानै वह बाम है॥४१०॥ बैठ्यौ कुण्ड तीर जाय, निकसैगो आय वन, दिये हैं लगाय, ताको फल भुगताइयै। लाल हिय सोच पर्यौ, कैसे भयौ जात वह, अऱ्यौ मग माँझ, भोग धर्यौ पै न खाइयै। कही श्रीगुसाँई जू सौं, मोकौं ये न भायो कछू, चाहौ जो खवावौ तौपै, वाकौं जा मनाइये। वाको हुतो दाँव, मोपै सो तौ भाव जान्यौ नहीं, कहै मोसौँ बातै सो कुमारै वेगि ल्याइये॥४११॥