श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६) (श्री भक्तमाल पृथ्वीपति आयौ, वृन्दावन मन चाह, भई सारँग सुनावै कोऊ, जोरावरी ल्यायै हैं। वल्लभ हूँ संग, सुर भरत ही छायौ रंग, अति ही रिझायौ, दृग अँसुवा बहाये हैं।। ठाढ़ौ कर जोरि, विनै करी पै न धरी हियै, जियै ब्रजभूमि ही सो, वचन सुनाये हैं। कैद करि साथ लिये, दिल्ली ते छुटाय दिये, हरीदास तूँवर नै, आये प्रान पाये हैं।। ५६३।। श्रीसोतीजी सोती श्लाघ्य सन्तनि सभा, दृतिय दिवाकर जानियो।। परम भक्ति परताप, धर्मध्वज नेजा धारी। सीतापति को सुजस, वदन शोभित अति भारी।। जानकी जीवन चरण, शरण थाती थिर पाई। नरहरि गुरू परसाद, पूत पोते चलि आई।। राम उपासक छाप दृढ़, और न कछु उर आनियो। सोती श्लाघ्य सन्तनि सभा, दृतिय दिवाकर जानियो।। १६३।। श्रीलालदासजी जीवत जस पुनि परमपद, लालदास दोनों लही।। हृदै हरीगुन खानि, सदा सत्संग अनुरागी। पद्मपत्र ज्यौं रह्यौ, लोभ की लहर न लागी।। विष्णुरात सम रीति, बघेरै त्यौं तन त्याज्यो। भक्त बरातीवृन्द, मध्य दूलह ज्यौं राज्यो।। खरी भक्ति हरिषांपुरे, गुरुप्रताप गाढ़ी गही। जीवत जस पुनि परमपद, लालदास दोनों लही।। १६४।। श्रीमाधवग्वालजी भक्तनि हित भगवत रची, देही माधवग्वाल की।। निसिदिन यहै विचार, दास जिहि विधि सुख पावैं। तिलक दाम सौं प्रीति, हृदै अति हरिजन भावैं।।