भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीप्रेमनिधिजी) (१५७ परमारथ सौं काज, हिये स्वारथ नहीं जानैं। दशधा मत्त मराल, सदा लीला गुण गानै।। आरत हरिगुण शील सम, प्रीति रीति प्रतिपाल की। भक्तनि हित भगवत् रची, देही माधवग्वाल की।। १६५।। श्रीप्रयागदासजी “श्रीअगर” सुगुरु परपात ते, पूरी परी प्रयाग की।। मानस वाचक काय, राम चरणनि चित दीनौ। भक्तनि सौं अति प्रेम, भावना करि सिर लीनौ।। रास मध्य निर्जन, देह दुतिदसा दिखाई। आड़ौ बलियौ अंक, महोच्छौ पूरी पाई।। क्यारे कलस औली ध्वजा, विदुष श्लाघा भाग की। “श्रीअगर” सुगुरू परताप तें, पूरी परी प्रयाग की।। १६६।। श्रीप्रेमनिधिजी प्रगट अमित गुन प्रेमनिधि, धन्य विप्र जिन नाम धर्यौ।। सुन्दर शील सुभाव, मधुर वानी मंगल करू। भक्तनि कौं सुख दैन, फल्यौ बहुधा दसधा तरू।। सदन बसत निर्वेद, सारभुक जगत् असंगी। सदाचार ऊदार, नेम हरिदास प्रसंगी।। दयादृष्टि बसि आगरैं, कथा लोक पावन कर्यौ।। प्रगट अमित गुन प्रेमनिधि, धन्य विप्र जिन नाम धर्यौ।। १६७।। प्रेमनिधि नाम, करैं सेवा अभिराम स्याम आगरौ शहर निसि, शेष जल ल्याइयै। बरखा सु रितु, जित तित अति कीच भई, भई चित चिन्ता, कैसे अपरसि आइयै।।