भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीगदाधरदासजी) (१६७ सदाचार मुनिवृत्ति, भजन भागवत उजागर। भक्तनि सौं अति प्रीति, भक्ति दशधा कौ आगर॥ सन्तोषी सुठि शील, हृदै स्वारथ नहिं लेसी। परमधर्म प्रतिपाल, सन्त मारग उपदेसी॥ श्रीभागवत बखानिकै, नीर क्षीर विवरन कर्यो। श्रीरामानुज पद्धति प्रताप, भट्ट लक्षमन अनुसर्यौ॥१८४॥ स्वामी श्रीकृष्णदासजी पयहारी दधीचि पाछें दूसरि करी, कृष्णदास कलि जीति॥ कृष्णदास कलि जीति, न्यौति नाहर पल दीयौ। अतिथि धर्म प्रतिपालि, प्रगट जस जग में लीयौ॥ उदासीनता अवधि, कनक कामिनी नहिं रात्यो। राम चरण मकरन्द, रहत निसिदिन मद मात्यों॥ गल तें गलित, अमित गुण सदाचार सुठि नीति। दधीचि पाछें दूसरि करी, कृष्णदास कलि जीति॥१८५॥ बैठे हे गुफा में, देखि सिंह द्वार आय गयौ, लयौ यों विचारि, हो अतिथि आज आयौ है। दई जाँघ काटि, डारि कीजियै अहार अज, महिमा अपार, धर्म कठिन बतायौ है॥ दियौ दरसन आय, साँच में रह्यौ न जाय, निपट सचाई दुख, जान्यौ न बिलायौ है। अन्न-जल देवे ही कौ, झींखत जगत् नर, करि कौन सकै, जन मन भरमायौ है॥६१३॥ श्रीगदाधरदासजी भलीभाँति निर्वही भगति, सदा गदाधरदास की॥ लालविहारी जपत, रहत निसिवासर फूल्यौ। सेवा सहज सनेह, सदा आनन्द रस झूल्यौ॥ भक्तनि सौं अति प्रीति, रीति सबही मन भाई। आशय अधिक उदार, रसन हरि कीरति गाई॥

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