श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६) (श्री भक्तमाल श्रीप्रबोधानन्दजी श्रीप्रबोधानन्द बड़े, रसिक आनन्दकन्द, श्रीचैतन्यचन्द्र जू के, पारषद प्यारे हैं। श्रीराधाकृष्ण कुँजकेलि, निपट नवेिल कही, झेलि रसरूप दोऊ, किये दृग तारे हैं।। वृन्दावन वास कौ, हुलास लै प्रकास कियौ, दियौ सुखसिन्धु, कर्म धर्म सब टारे हैं। ताहि सुनि-सुनि कोटि-कोटिजन, रंग पायौ, विपिन सुहायौ बसे, तन मन वारे हैं।।६१२।। श्रीद्वारकादासजी अष्टांगयोग तन त्यागियौ, द्वारकादास जानै दुनि।। सरिता कूकस गाँव, सलिल में ध्यान धर्यौ मन। राम चरण अनुराग, सुदृढ़ जाके साँचौ पन।। सुत कलत्र धन धाम, ताहि सौं सदा उदासी। कठिन मोह कौ फंद, तरकि तोरी कुल फाँसी।। कील्ह कृपा बल भजन के, ज्ञान खड्ग माया हनी। अष्टांगयोग तन त्यागियौ, द्वारकादास जानै दुनि।।१८२।। श्रीपूर्णजी पूरन प्रगट महिमा अनन्त, करिहै कौन बखान।। उदै अस्त, परवत गहिर मधि, सरिता भारी। जोग जुगति विश्वास, तहाँ दृढ़ आसन धारी।। व्याघ्र सिंघ गुँजैं, खरा कछु शंक न मानै। अर्द्ध न जातैं पौन, उलटि ऊरध कौं आनै।। साखि शब्द निर्मल, कहा, कथिया पद निर्वान। पूरन प्रगट महिमा अनन्त, करिहै कौन बखान।। १८३।। श्रीलक्ष्मणभट्टजी श्रीरामानुज पद्धति प्रताप, भट्ट लक्ष्मन अनुसर्यौ।।