श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरमधर्म पोषक संन्यायी भक्त) (१६५ पीठ परीक्षित सारका, सभा शाष सन्तन कही। टेक एक वंशी तनी, जन गोविन्द की निर्वही॥ श्रीकृष्णदासजी नन्दकुँवर कृष्णदास कौं, निज पग तें नूपुर दियौ॥ तान मान सुर ताल, सुलय सुन्दरि सुठि सोहै। सुधा अंग भ्रूभंग, गान उपमा को कोहै॥ रत्नाकर संगीत, रागमाला रँगरासी। रिझये राधालाल, भक्तपद रेनु उपासी॥ स्वर्णकार खरगू सुवन, भक्त भजनपन दृढ़ लियौ। नन्दकुँवर कृष्णदास कौं, निज पग तें नूपुर दियौ॥१८०॥ कृष्णदास ये सुनार, राधाकृष्ण सुखसार, लियौ सेवा पाछे, नृत्य-गान बिसतारिये। ह्वै करि मगन काहू, दिन तन सुधि भूली, एक पग नूपुर सो, गिर्यौ न सँभारिये॥ लाल अति रंग भरे, जानी गति भंग भई, पाँय निज खोलि, आप बाँध्यौ सुख भारिये। फेरि सुधि आई, देखि धारा लै बहाई नैन, कीरति यों छाई, जग भक्ति लागी प्यारिये॥६११॥ परमधर्म पोषक संन्यासी भक्तजी परमधर्म प्रति पोषकौं, संन्यासी ए मुकुटमनि॥ चित्सुख टीकाकार, भक्ति सर्वोपरि राखी। श्रीदामोदर तीर्थ, रामअर्चन विधि भाखी॥ चन्द्रोदय हरिभक्ति, नरसिंहारन कीनी। माधौ मधूसूदन सरस्वती, परमहंस कीरति लीनी॥ प्रबोधानन्द रामभद्र, जगदानन्द कलिजुग्ग धनि। परमधर्म प्रति पोषकौं, संन्यासी ए मुकुटमनी॥१८१॥