श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४) (श्री भक्तमाल खोलिकै दिखायो नृप, मूरछा गिरायो तन, धन की न बात, अब याकौ कहा कीजिये। मै जु दीनौ हाथ जानि, आनि ग्रीवा जोरि दई, लई वही रीझि पद, तन सुनि जीजिये।।६०६।। सुनी जगदेव रीति, प्रीति नृपराज सुता, पिता सौं बखानि कही, वाही कौ लै दीजिये। तबतौ बुलाये, समुझाये बहुभाँति खोलि, वचन सुनाये, अजू बेटी मेरी लीजिये।। नट्यौ सतबार जब, कही डारौ मारि, चले मारिवे कौं बोली, वह मारौ मत भीजिये। दृष्टि सौं न देखें, कही ल्यायौ काटि मूँड़ लाये, चाहै सीस आँखिन को, गयौ फिरि रीझियै।।६०७।। निष्ठा रिझवार रीति, कीनी विसतार यह, सुनौ साधुसेवा, हरीदास जू ने करी है। परदा न सन्त सौं है, देत हैं अनन्त सुख, रह्यौ सुख जानि, भक्तसुता चित धरी है।। दोऊ मिलि सोवैं रितु, ग्रीषम की छत पर, गात पर गात सोये, सुधि नही परी है। दातुन के करिवे को, चढ़े निसि शेष आप, चादर उड़ाय, नीचे आये ध्यान हरी है।।६०८।। जागि परे दोऊ, अरबरे देखि चादर कौं, पेखि पहिचानी सुता, पिता ही की जानी है। सन्त दृग नये, चले, बैठे मग पग लये, गये लै एकान्त में, यो, विनती बखानी है।। नेकु सावधान ह्वैकै, कीजिये निशंक काज, दुष्टराज छिद्र पाय, कहैं कटु वानी है। तुमको जु नांव धरैं, जरै सुनि हियौ मेरौ, डरैं निन्दा आपनी न, होत सुखदानी है।।६०९।। इतनी जतावनी में, भक्ति कौं कलंक लगै, ऐपे शंक वही, साधु घटती न भाइयै। भई लाज भारी, विषै बास धोय डारी, नीके जीके दुखरासि, चाहै कहूँ उठि जाइयै।। निपट मगन किये, नानाविधि सुख दिये, दिये पै न जान, मिलि लालन लड़ाइयै। गोविन्द अनुज जाके, बाँसुरी कौ साँचोपन, मन में न ल्यायो नृप इहि विधि गाइयै।।६१०।। (किसी प्रति में यह एक अतिरिक्त छप्पय भी प्राप्त है) श्रीगोविन्ददासजी टेक एक वंशी तनी, जन गोविन्द की निर्वही।। युगलचन्द किरपाल, तासु को दास कहावै। बादशाह सौं पैज, हुकुम नहिं वेनु बजावै।। बीकावत बानैत, भक्त पाण्डव अवतारी। कपि ज्यौं बीरा लियो, सीस अम्बर कै झारी।।