श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीहरीदासजी) (१६३ भगवन्त रचे भारी भगत, भक्तनि के सनमान को।। क्वाहब श्रीरँग सुमति, सदानन्द सर्वसु त्यागी। श्यामदास लघुलम्ब, अननि लाखै अनुरागी।। मारू मुदित कल्यान, परस वंसी नारायन। चेता ग्वाल गोपाल, शंकर लीला पारायन।। सन्तसेय कारज किया, तोषत श्याम सुजान को। भगवन्त रचे भारी भगत, भक्तनि के सनमान को।।१७८।। श्रीहरीदासजी तिलक दाम पर काम कौं, हरीदास हरि निर्मयो।। सरनागत कौं सिविर दान, दधीचि टेक बलि। परमधर्म प्रहलाद, सीस देन जगदेव कलि। बीकावत बानैत, भक्तपंन धर्मधुरन्धर। तूँवर कुलदीपक, सन्तसेवा नित अनुसर।। पारथपीठ अचरज कौन, सकल जगत् में जस लियो। तिलक दाम पर काम कौं, हरीदास हरि निर्मयो।।१७६।। प्रह्लाद आदि भक्त, गाये गुन भागवत, सब, इकठोर आये, देखे हरिदास में। रीझि जगदेव सो यों, कहिकै बखान कियौ, जानत न कोऊ सुनौ, कर्यौ ले प्रकास में।। रहै एक नटी, शक्तिरूप गुन जटी गावै, लागै चटपटी, मोह पावै मृदुहास में। राजा रिझवार, करै देवे को विचार, पै न पावै सार, काटै सीस, राख्यो तेरे पास में।।६०४।। दियौ कर दाहिनो में, यासौं नहीं जाचौं कहूँ, सुनि एक राजा, भेदभाव सौं बुलाई है। नृत्य करि गाई, रीझि लेवौ कही, आई देहु ओड्यौ बाँयों हाथ, रिस भरिकै सुनाई है।। इतौ अपमान, पानि दच्छिन लै दियौ अहो, नृप जगदेव जू कौं, ऐसी कहा पाई है। तासौं दसगुनी लीजै, मोकौं सो दिखाय दीजै, दई नहीं जाय, काहु मोहिये सुहाई है।।६०५।। कितौ समुझावै, ल्यावौ कहै यहै जक लागी, गई बड़भागी पास, वस्तु मेरी दीजिये। काटि दियो सीस, तन रहै ईश शक्ति लखो, ल्याई बकसीस, थार ढाँपि देखि लीजिये।