श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२) (श्री भक्तमाल श्रीहरिवंशजी निहिकिंचन भक्तनि भजैं, हरि प्रतीति हरिवंश के।। कथा कीर्तन प्रीति, सन्तसेवा अनुरागी। खरिया खुरपा रीति, ताहि ज्यौं सर्वसु त्यागी।। सन्तोषी सुठि शील, असद् आलाप न भावै। काल वृथा नहिं जाय, निरन्तर गोविन्द गावै।। सिष सपूत श्री रंग को, उदित पारषद अंस के। निहिकिंचन भक्तनि भजैं, हरि प्रतीति हरवंश के।। १७५।। श्रीकल्याणजी हरिभक्ति भलाई गुन गम्भीर, बाँटे परी कल्यान के।। नवलकिशोर दृढ़व्रत, अनन्य मारग इक धारा। मधुर वचन मन हरन, सुखद जानत संसारा।। पर उपकार विचार, सदा करुना की रासी। मन वच सर्वसु रूप, भक्तपद रेनु उपासी।। धर्मदास सुत शील सुठि, मन मान्यौ कृष्ण सुजान के। हरिभक्ति भलाई गुन गम्भीर, बाँटे परी कल्यान के।। १७६।। श्रीबीठलदासजी बीठलदास हरिभक्ति के, दुहूँ हाथ लाडू लिये।। आदि अन्त निर्वाह, भक्तपद रज व्रतधारी। रह्यौ जगत् सौं ऐंड़, तुच्छ जाने संसारी।। प्रभुता पति की पधति, प्रगट कुल दीप प्रकासी। महत् सभा में मान, जगत् जानै रैदासी।। पद पढ़त भई परलोक गति, गुरू गोविन्द जुग फल दिये। बीठलदास हरिभक्ति के, दुहूँ हाथ लाडू लिये।। १७७।।