भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीआशकरणजी) (१६१ करुनानिधान कोऊ, सुने नहीं कान कहूँ, बैल के लगायौ साँटौ, लोटे दया आयकै। उपट्यो प्रगट तन, मन की सचाई अहो, भये तदाकार कहौं, कैसे समुझायकै।। ६०० ।। श्रीआशकरणजी (श्री) मोहन मिश्रित पद कमल, आसकरन जस विस्तर्यौ ।। धर्मशील गुनसींव, महा भागवत राजरिषि। पृथीराज कुलदीप, भीम सुत विदित कील्ह सिषि।। सदाचार अति चतुर, विमल वानी रचना पद। सूरधीर ऊदार, विनै भलपन भक्तनि हद।। सीतापति राधासुवर, भजन नेम कूरम धर्यौ। (श्री) मोहन मिश्रित पद कमल, आसकरन जस विस्तर्यौ।। १७४।। नरवर पुर ताकौ, राजा नरवर जानौ, मोहन जू धरि हियें, सेवा नीके करी है। घरी दस मन्दिर में रहें, रहै चौकी द्वार, पावत न जान कोऊ, ऐसी मति हरी है।। पर्यो कोऊ काम, आय अबहि लिवाय ल्यावौ, कहै पृथीपति, लोग कान में न धरी है। आई फौज भारी, सुधि दीजिये हमारी सुनि, बहू बात टारी, परी अति खरबरी है।।६०१।। कहिकै पठाई कहौ, कीजियै लराई सुनि, रुचि उपजाई चलि, पृथीपति आयौ है। पर्यौ सोच भारी, तब बात यों विचारी, कही आप एक जावौ, गयौ अचरज पायौ है।। सेवा करि सिद्धि, साष्टांग ह्वैकै भूमि परे, देखि बड़ी बेर, पाँव खड्ग लगायौ है। कटि गई एड़ी, एपै टेढिहू न भौंह करी, करी नित नेम रीति, धीरज दिखायौ है।। ६०२।। उठि चिक डारि तब, पाछें सो निहारि कियौ, मुजरा विचारि, बादशाह अति रीझे हैं। हित की सचाई यहै, नेकु न कचाई होत, चरचा चलाई भाव, सुनि-सुनि भीजे हैं।। बीते दिन कोऊ, नृप भक्त सो समायौ, पृथीपति दुख पायौ, सुनि भोग हरि छीजे हैं। करैं विप्र सेवा, तिन्हें गाँव लिखि न्यारे दिये, वाके प्रान न्यारे, लाड़ करौ कहि धीजे हैं।।६०३।। मास परायण अट्ठाईसवाँ विश्राम