श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६०) (श्री भक्तमाल ज्यौं साखा द्रुम चन्द, जगत् सौं इहि विधि न्यारौ। सर्वभूत समदृष्टि, गुननि गम्भीर अति भारौ॥ भक्त भलाई वदन नित, कुवचन कबहुँ नहीं कह्यौ। कान्हरदास सन्तनि कृपा, हरि हिरदै लाहौ लह्यौ ॥ १७१॥ श्रीकेशवलटेरा, श्रीपरशुरामजी लट्यौ लटेरा आन विधि, परम धरम अति पीन तन।। कहनी रहनी एक, एक प्रभुपद अनुरागी। जस वितान जग तन्यौ, सन्त सम्मत बड़भागी।। तैसोइ पूत सपूत, नूत फल जैसोइ परसा। हरि हरिदासनि टहल, कवित रचना पुनि सरसा।। (श्री) सुरसुरानन्द सम्प्रदाय दृढ़, केसव अधिक उदार मन। लट्यौ लटेरा आन विधि, परम धरम अति पीन तन ।। १७२ ।। श्रीकेवलरामजी केवलराम कलियुग्ग के, पतित जीव पावन किये।। भक्ति भागवत विमुख, जगत् गुरू नाम न जानैं। ऐसे लोक अनेक, ऐंचि सनमारग आनैं।। निर्मल रति निहकाम, अजा तें सदा उदासी। तत्वदरसी तमहरन, शील करूना की रासी। तिलक दाम नवधारतन, कृष्ण कृपा करि दृढ़ दिये। केवलराम कलियुग्ग के, पतित जीव पावन किये।। १७३ ।। घर-घर जाय कहैं, यहै दान दीजै मोकौं, कृष्ण सेवा कीजै, नाम लीजै चित लायकै। देखे भेषधारी, दस बीस कहूँ, अनाचारी दये प्रभु सेवनि कौं, रीति दी सिखायकै।।