श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
पृष्ठ 184, कुल 195 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकल्याणजी) (१६६ आये बद्रीनाथ जू तें, मथुरा निहारि नैन, चैन भयौ रहें, जहाँ केसौ जू कौ द्वार है।। आवैं दरसनी लोग, जूतनि कौ सोग हिये, रूप कौ न भोग, होत कियौ यों विचार है।। करें रखवारी, सुख पावत हैं भारी, कोऊ जानै न प्रभाव, उर भाव सो अपार है। आयौ एक दुष्ट, पोट पुष्ट सो तौ सीस दई, लई चले मग, ऐसौ धीरज कौ सार है।।६१८।। कोऊ बड़ौ नर, देखि मग पहिचानि लिये, किये परनाम भूमि, परि भरि नेह कौ। जानिकै प्रभाव, पाँव लीने महादुष्ट हूँ नै, कष्ट अति पायो, छूट्यौ अभिमान देह कौ।। बोले आप चिन्ता जिनि, करौ तेरौ काम होत, नैन नीर सोत, मुख देखौं नही गेह कौ। भयौ उपदेस, भक्ति देस, उन जान्यौ साधु, शक्ति कौ विशेष, इहाँ जानौ भाव मेह कौ।।६१९।। श्रीभगवानदासजी भगवानदास श्रीसहित नित, सुहृद् शील सज्जन सरस ।। भजन भाव आरूढ़, गूढ़ गुन बलित ललित जस। श्रोता श्रीभागवत, रहसि ज्ञाता अक्षर रस।। मथुरापुरी निवास, आस पद सन्तनि इक चित। श्रीजुत खोजी श्याम, धाम सुखकर अनुचर हित।। अति गम्भीर सुधीर मति, हुलसत मन जाके दरस। भगवानदास श्री सहित नित, सुहृद शील सज्जन सरस ॥१८८॥ जानिवे कौं पन, पृथीपति मन आई यों, दुहाई लै दिवाई, माला तिलक न धारियै। मानि आनि प्रान लोभ, केतिकनि त्याग दिये, छिपे नहीं जात, जानी वेगि मारि डारियै।। भगवानदास उर, भक्ति सुखरासि भर्यौ, कर्यौ लै सुदेश, देश रीति लागी प्यारियै। रीझ्यौ नृप, देखि रीझि मथुरा निवास पायौ, मन्दिर करायौ, हरिदेव सौं निहारियै ।। ६२० ।। श्रीकल्याणदासजी भक्तपक्ष उद्दारता, यह निवही कल्यान की।। जगन्नाथ कौ दास, निपुन अति प्रभु मन भायौ। परम पार्षद समुझि, जानि प्रिय निकट बुलायौ ।।