भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 195 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 188

श्रीभगवन्तमुदितजी) (१७३ अति आनन्द मन उमँगि, सन्त परिचर्या करई। चरण धोय दण्डौत, विविध भोजन विस्तरई॥ बछवन निवास विस्वास हरि, जुगल चरण उर जगमगत। श्रीरामदास रसरीति सौं, भलीभाँति सेवत भगत॥ १६६॥ सुनि एक साधु आयौ, भक्तिभाव देखिवे कौं, बैठें रामदास पूछै, रामदास कौन है। उठै आप, धोये पाँव, आवै रामदास अब, रामदास कहाँ? मेरे चाह और गौन है॥ चलौ जू प्रसाद लीजै, दीजै रामदास आनि, यही रामदास, पग धारौ निज भौन है। लपटानौ पाँयनि सौं, चायनि समात नाहिं, भायनि सौं भयौ हिये, छाई जस जौन्ह है॥६२४॥ बेटी कौ विवाह घर, बड़ौ उतसाह भयौ, किये पकवान नाना, कोठे माँझ धरे हैं। करैं रखवारी सुत, नाती दिये तारौ रहें, और ही लगाई तारी, खोल्यौ नहीं डरे हैं॥ आये गृह सन्त, तिन्हें पोट बँधवाय दई, पायौ यों अनन्त सुख, ऐसे भाव भरे हैं। सेवा श्रीविहारीलाल, गाई पाक शुद्धताई, मेरे मनभाई सब साधु उर हरे हैं॥६२५॥ मास परायण उन्तीसवाँ विश्राम श्रीरामरायजी विप्र सारसुत घर जनम, रामराय हरि रति करी॥ भक्ति ज्ञान वैराग, जोग अन्तरगति पाग्यौ। काम क्रोध मद लोभ, मोह मत्सर सब त्याग्यौ॥ कथा कीरतन मगन, सदा आनन्द रस झूल्यौ। सन्त निरखि मन मुदित, उदित रवि पंकज फूल्यौ॥ बैर भाव जिन द्रोह किय, तासु पाग खसि भ्वैं परी। विप्र सारसुत घर जनम, रामराय हरि रति करी॥१६७॥ श्रीभगवन्तमुदितजी भगवन्तमुदित उदार जस, रस रसना आस्वाद किय॥