श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२) (श्री भक्तमाल प्रेमी भक्त प्रसिद्ध, गान अति गद्गद वानी। अन्तर प्रभु सौं प्रीति, प्रगट रहै नाहिन छानी॥ नृत्य करत आमोद, विपिन तन वसन बिसारै। हाटक पट हित दान, रीझि तत्काल उतारै॥ मालपुरै मंगल करन, रास रच्यौ रसरंग कौ। गिरिधरन ग्वाल गोपाल कौं, सखा साँचलो संग कौ।। १६४।। गिरिधर ग्वाल साधुसेवा ही कौ ख्याल जाके, देखि यों निहाल होत, प्रीति साँची पाई है। सन्त तन छूटेहूँ ते, लेत चरनामृत जो, और अब रीति कहौ, कापै जात गाई है।। भये द्विज पंच, इकठौरे सो प्रपंच मान्यो, आन्यो सभा माँझ, कहें छोड़ौ न सुहाई है। जाके हो अभाव, मत लेवौ मैं प्रभाव जानौ, मृतक यों बुद्धि ताकौ, वारो सुनि भाई है।। ६२३।। श्रीगोपालीजी गोपाली जनपोषकौं, जगत् जसोदा अवतरी।। प्रगट अंग में प्रेम, नेम सौं मोहन सेवा। कलियुग कलुष न लग्यौ, दास तें कबहुँ न छेवा।। वानी सीतल सुखद, सहज गोविन्द धुनि लागी। लक्षन कला गँभीर, धीर सन्तनि अनुरागी।। अन्तर शुद्ध सदाँ रहै, रसिक भक्ति निज उर धरी। गोपाली जनपोषकौं, जगत् जसोदा अवतरी।। १६५।। श्रीरामदासजी श्रीरामदास रसरीति सौं, भलीभाँति सेवत भगत।। सीतल परम सुशील, वचन कोमल मुख निकसै भक्त उदित रवि देखि, हृदै बारिज जिमि विकसै।।