श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीगिरिधरग्वालजी) (१७१ रुचिर शील घन नील, लील रुचि सुमति सरित पति। विविध भक्त, अनुरक्त व्यक्त, बहु चरित चतुर अति। लघु दीरघ सुर, शुद्ध वचन अविरुद्ध उचारन। विश्व वास विश्वास, दास परिचय विस्तारन।। जानि जगत् हित सब गुननि, सु सम नारायनदास दिय। भक्तरत्न माला सुधन, गोविन्द कण्ठ विकास किय।। १६२ ।। श्रीजगत्सिंहजी भक्तेश भक्त भवतोष कर, सन्त नृपति वासो कुँवर।। श्रीयुत् नृप मनि जगत्सिंह, दृढ़भक्ति परायन। परम प्रीति किये सुवश, शील लक्ष्मी नारायन।। जासु सुजस सहज ही कुटिल, कलि कल्प जु घायक। आज्ञा अटल सुप्रगट, सुभट कटकनि सुखदायक।। अति प्रचण्ड मारतण्ड सम, तम खण्डन दोरदण्ड वर। भक्तेश भक्त भवतोष कर, सन्त नृपति वासो कुँवर।। १६३।। जगता कौ तन, मन, सेवा श्रीनारायन जू भयौ ऐसौ परायन रहै डोला संग ही। लरिवे कौं चलै आगे, आगै सदा पाछै रहै, ल्यावै जल सीस, ईश भर्यौ हियौ रंग ही।। सुनि जसवन्त, जयसिंह कै हुलास भयौ, देख्यौ दिल्ली माँझ, नीर ल्यावत अभंग ही। भूमि परि विनै, करी, धरी देह तुम्हहिं नै, जातै पायौ नेह, भींजि गये यों प्रसंग ही।। ६२१।। नृपति जयसिंह जू सौं, बोल्यौ कहा नेह मेरे? तेरे जो बहिन, ताकी गन्ध को न पाऊँ मैं। नाम दीपकुँवरि, सो बड़ी भक्तिमान् जानि, वह रसखानि ऐपै, कछुक लड़ाऊँ मैं।। सुनि सुख भयौ भारी, हुती रिस वासौं टारी, लिये गाँव काढ़ि, फेरि दिये हरि ध्याऊँ मैं। लिखिकै पठाई बाई, करैं सो करन दीजै, लीजै साधुसेवा करि, निसिदिन गाऊँ मैं।। ६२२।। श्रीगिरिधरग्वालजी गिरिधरन ग्वाल गोपाल कौं सखा साँचलौ संग कौ।।