श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
पृष्ठ 190, कुल 195 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीलालमतीजी) (१७५ गौर स्याम सौं प्रीति, प्रीति जमुना कुँजनि सौं। वंशीवट सौं प्रीति, प्रीति ब्रजरज पुंजनि सौं॥ गोकुल गुरुजन प्रीति, प्रीति घन बारह वन सौं। पुर मथुरा सौं प्रीति, प्रीति गिरि गोवर्द्धन सौं॥ वास अटल वृन्दाविपिन, दृढ़करि सो नागरि कियौ। दुर्लभ मानुष देह कौ, लालमती लाहौ लियौ॥ १६६॥ भक्त-परत्व कविजन करत विचार, बड़ौ कोउ ताहि भनिज्जै। कोउ कह अवनी बड़ी, जगत आधार फनिज्जै॥ सो धारी सिर शेष, शेष शिव भूषन कीनौ। शिव आसन कैलास, भुजा भरी रावन लीनौ॥ रावन जीत्यौ बालि, बालि राघो इक सायक दँड़े। ''अगर'' कहैं त्रैलोक में, हरि उर धरें तेई बड़ै॥ २००॥ हरि सुजस प्रीति हरिदास कैं, त्यौ भावै हरिदास जस॥ नेह परसपर अघट, निबहि चारों जुग आयौ। अनुचर कौ उत्कर्ष, स्याम अपने मुख गायौ॥ ओत-प्रोत अनुराग, प्रीति सबही जग जानें। पुर प्रवेश रघुवीर, भृत्य कीरति जु बखानैं॥ ''अगर'' अनुग गुन बरनते, सीतापति नित होयँ बस। हरि सुजस प्रीति हरिदास कैं, त्यौ भावै हरिदास जस॥२०१॥ सन्त-उत्कर्ष उत्कर्ष सुनत सन्तनि कौं, अचरज कोऊ जिनि करौ॥