श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७६) (श्री भक्तमाल दुर्वासा प्रति स्याम, दास बसता हरि भाषौ। ध्रुव गज पुनि, प्रह्लाद राम शबरी फल साखी॥ राजसूय जदुनाथ, चरण धोय जूठ उठाई। पाण्डव विपति निवारि, दियौ विष विषया पाई॥ कलि विशेष परचौ प्रगट, आस्तिक ह्वैकै चित धरौ। उत्कर्ष सुनत सन्तनि कौं अचरज कोऊ जिनि करौ॥२०२॥ • अन्तिम मंगलाचरण = प्रार्थना = — दोहा — पादप पीड़हिं सींचते, पावै अँग-अँग पोष। पूरबजा जयौं बरनते, सब मानियो सन्तोष॥२०३॥ भक्त जिते भू-लोक में, कथै कौन पै जायँ। समुद्र पान श्रद्धा करै, कहँ चिरि पेट समायँ॥२०४॥ श्रीमूरति सब वैष्णव, (लघु) दीरघ गुणनि अगाध। आगे पीछे बरनते, जिनि मानौ अपराध॥२०५॥ फल की शोभा लाभ तरू, तरू शोभा फल होय। गुरु शिष्य की कीर्ति में, अचरज नाहीं कोय॥२०६॥ चारि जुगन में भगत जे, तिनके पद की धूरि। सर्वसु सिर धरि राखिहौं, मेरी जीवन मूरि॥२०७॥