श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८) (श्री भक्तमाल (टीकाकर्त्ता-श्रीप्रियादासजी अपने श्रीगुरुदेवजी का वर्णन करते हैं) रसिकाई कविताई, जाहि दीनी तिनि पाई, भई सरसाई हिये, नव-नव चाय हैं। उर रंगभवन में, राधिकारवन बसैं, लसैं ज्यौं मुकुर मध्य, प्रतिबिम्ब भाय हैं॥ रसिक समाज में, विराज रसराज कहैं, चहैं मुख सब फूलैं, सुख समुदाय हैं। जन मन हरि लाल, मनोहर नांव पायो, उनहूँ को मन हरि लीनौ, यातो राय हैं॥६३०॥ इनहीं के दास-दास-दास प्रियादास जानौं, तिन लै बखानौं, मानौं टीका सुखदाई है। गोवर्द्धननाथ जू कें, हाथ मन पऱ्यौ जाको, कर्यौ वास वृन्दावन, लीला मिलि गाई है॥ मति उनमान कह्यौ, लह्यौ मुख सन्तनि के, अन्त कौन पावै, जोई गावै हिय आई है। घट बढ़ जानि, अपराध मेरौ क्षमा कीजै, साधु गुणग्राही, यह मानि मैं सुनाई है॥६३१॥ कीनी भक्तमाल, सुरसाल नाभा स्वामी जू ने तरे, जीव जाल, जग जन मन मोहनी। भक्तिरसाबोधिनी सो, टीका मति सोधिनी है, बाँचत कहत अर्थ, लागै अति सोहनी॥ जोपै प्रेम लक्षना की, चाह अवगाहि याहि, मिटै उर दाह, नेकु नैननि हूँ जोहनी। टीका अरु मूल नाम, भूल जात सुनै जब, रसिक अनन्य मुख, होत विश्वमोहनी॥६३२॥ टीका का उपसंहार नाभा जू कौ अभिलाष, पूरन लै कियौ मैं तौ, ताकी साखी प्रथम सुनाई, नीके गाइकै। भक्ति विसवास जाके, ताही कौं प्रकास कीजै, भीजै रंग हियो लीजै, सन्तनि लड़ाइकै॥ सम्वत् प्रसिद्ध दस, सात सत उन्हत्तरं, फालगुन मास वदी, सप्तमी बिताइकै। “नारायणदास” सुखरासि भक्तमाल लैकै, “प्रियादास” दास उर, बसौ रहौ छाइकै॥६३३॥ टीकाकार की विज्ञप्ति अगिनि जरावौ लैकै जल में बुड़ावौ, भावे सूली पै चढ़ावौ, घोरि गरल पियायबी। बीछू कटवावौ, कोटि साँप लपटावौ, हाथी आगे डरवावौ, ईति भीति उपजायबी॥ सिंह पै खवावौ, चाहौ भूमि गड़वावौ, तीखी अनी विंधवावौ, मोहिं दुख नही पायबी। ब्रजजन प्रान, कान्ह बात यह कान करौ, भक्त सौं विमुख ताको, मुख न दिखायबी॥६३४॥ मास परायण तीस विश्राम नवाह परायण नवमां विश्राम सप्ताह परायण सप्त विश्राम ।। श्रीप्रियादासजी कृत भक्तिरसबोधिनी टीका समाप्त ।।