श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६) (श्री भक्तमाल श्रीहनुमानजी रतन अपार क्षीरसागर उधार किये, लिये हितचायकै बनाय माला करी है। सब सुख साज रघुनाथ महाराज जू को, भक्ति सौं विभीषन जू आनि भेंट धरी है।। सभा ही की चाह अवगाह हनुमान गरे, डारि दई सुधि भई मति अरबरी है। राम बिन काम कौन फोरि मनि दीन्हें डारि, खोलि त्वचा नाम ही दिखायो बुद्धि हरी है।।२७।। श्रीविभीषणजी भक्ति जो विभीषन की कहै ऐसो कौन जन, ऐपै कछू कही जाति सुनो चित लायकै। चलत जहाज पर अटकि विचार कियो, कोऊ अंगहीन नर दियो लै बहायकै।। जाय लग्यो टापू ताहि राक्षसनि गोद लियो, मोद भरि राजा पास गये किलकायकै। देखत सिंहासन ते कूदि परे नैन भरे, याही के आकार राम देखे भाग पायकै।।२८।। रचिकै सिंहासन पै लै बैठायो ताहि छन, राक्षसन रीझि देत मानि शुभ घरी है। तऊ न प्रसन्न होत छन-छन छीन ज्योति, हूजिये कृपाल मति मेरी अति हरी है।। चाहत मुखारविन्द अति ही आनन्द भरि, ढरकत नैन नीर टेकि ठाढ़ो छरी है। करो सिन्धु पार मेरे यही सुखसार दियो, रतन अपार लाये वाही ठौर फिरी है।।२६।। राम नाम लिखि सीस मध्य धरि दियो याको, यही जल पार करै भाव साँचो पायो है। ताहि ठौर बढ़्यो मानो नयो और रूप भयो, गयो जो जहाज सोई फेरि करि आयो है।। लियो पहिचानि पूछ्यो सब सो बखान कियो, हियो हुलसायो सुनि विनै कै चढ़ायो है। पर्यो नीर कूदि नेकु माया ने प्रवेस कर्यो, हर्यो मन देखि रघुनाथ नाम भायो है।।३०।। श्रीशबरीजी वन में रहति नाम सबरी कहत सब, चाहत टहल साधु तनु न्यूनताई है। रजनी के शेष ऋषि आश्रम प्रवेस करि, लकरीन बोझ धरि आवै मनभाई है।। न्हाइवे को मग झारि काँकरनि बीनि डारि, वेगि उठि जाइ नेकु देति न लखाई है। उठत सँवारें कहै कौन धौं बुहारि गयो भयो, हिये सोच कोउ बड़ो सुखदाई है।।३१।। बड़ेई असंग वे मतंग रसरंग भरे, धरे देखि बोझ कह्यो 'कौन चोर आयो है'। करै नित चोरी अहो ! गहो वाहि एक दिन, बिना पाये प्रीति वाकी मन भरमायो है।। बैठे निसि चौकी देत शिष्य सब सावधान, आय गई, गहि लई, काँपै तनु नायो है। देखत ही ऋषि जलधारा बही नैनन ते, बैनन सौं कह्यो जात कहा कछु पायो है।।३२।।