श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीअम्बरीषजी) (१७ डीठि हू न सोहीं होत मानि तन गोत छोट, परी जाय सोच सोत कैसे कै निकारिये। भक्ति को प्रताप ऋषि जानत निपट नीके, कैऊ कोटि विप्रताई यापै वारि डारिये।। दियो वास आश्रम में श्रवन में नाम दियो, कियो सुनि रोष सबै कीनी पाँति न्यारिये। सबरी सौं कह्यो तुम राम दरसन करो, मैं तो परलोक जात आज्ञा प्रभु पारिये।। ३३।। गुरु को वियोग हिये दारुन लै शोक दियो, जियो नहीं जात तऊ राम आसा लागी है। न्हाइवे को घाट निसि जात ही बुहारि सब, भई यो अबार ऋषि देखि व्यथा पागी है।। छुयो गयो नेकु कहूँ खीझत अनेक भाँति, करिकै विवेक गयो न्हान यह भागी है। जल सो रुधिर भयो नाना कृमि भरि गयो, नयो पायो सोच तौहू जानै न अभागी है।। ३४।। लावै वन बेर लागी राम की अवसेर फल, चाखै धरि राखै फिर मीठे उन जोग हैं। मारग में जाइ रहै लोचन बिछाय, कभूँ आवैं रघुराइ दृग पावैं निज भोग है।। ऐसे ही बहुत दिन बीते मग जोहत ही, आय गये औचक सो मिटे सब सोग हैं। ऐपै तनु न्यूनताई आई सुधि छिपी जाय पूछें, आप ‘सबरी कहाँ?’ ठाढ़े सब लोग हैं।। ३५।। पूछि-पूछि आये तहाँ सबरी अस्थान जहाँ, ‘कहाँ वह भागवती? देखौं दृग प्यासे हैं’। आय गई आश्रम में जानिकै पधारे आप, दूर ही ते साष्टांग करी चख भासे हैं।। रवकि उठाय लई विथा तनु दूरि गई, नई नीर झरी नैन परे प्रेम पासे हैं। बैठे सुख पाइ फल खाइकै सराहबे वेई कौं कह्यौ कहा कहौं मेरे मग दुख नासे हैं।। ३६।। करत हैं सोच सब ऋषि बैठे आश्रम में, जल को बिगार सो सुधार कैसे कीजिये। आवत सुने हैं वन पन्थ रघुनाथ कहूँ, आवैं जब कहैं याको भेद कहि दीजिये।। इतने ही माँझ सुनी ‘सबरी के विराजे आन’, गयो अभिमान चलो पग गहि लीजिये। आये खुनसाय कही नीर कौ उपाय कहौ ‘गहौ पग भीलिनी के’ छुये स्वच्छ भीजिये।। ३७।। श्रीजटायुजी जानकी हरन कियो रावन मरन काज, सुनि सीता वानी खगराज दौरयो आयो है। बड़ी ये लड़ाई लीन्हीं देह वारि फेरि दीन्हीं, राखे प्रान राम मुख देखिवो सुहायो है।। आये आपु गोद सीस धारि दृगधार सींच्यो, दई सुधि लई गति तनहूँ जरायो है। दसरथवत मान कियो जल दान यह, अति सनमान निज रूप धाम पायो है।। ३८।। श्रीअम्बरीषजी अम्बरीष भक्त की जो रीस कोऊ करै और, बड़ो मति बौर किहूँ जान नहिं भाखिये। दुरवासा ऋषि सीख सुनी नहीं कहूँ साधु, मानि अपराध सिर जटा खैंचि नाखिये।।