श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८) (श्री भक्तमाल लई उपजाय कालकृत्या विकराल रूप, भूप महाधीर रह्यो ठाढ़ो अभिलाखिये। चक्र दुख मानि लै कृशानु तेज राख करी, परी भीड़ ब्राह्मण को भागवत साखिये॥३९॥ भाज्यो दिशा-दिशा सब लोक लोकपाल पास, गये नयो तेज चक्र चून किये डारे हैं। ब्रह्मा शिव कही यह गही तुम टेव बुरी, दासनि को भेद नहीं जान्यो वेद धारे हैं॥ पहुँचे वैकुण्ठ जाय कह्यो दुख अकुलाय, 'हाय हाय राखौ प्रभु ! खरौ तन जारे हैं'। 'मैं तो हौं अधीन तीनि गुन को न मान मेरे, भक्तवात्सल्य गुन सबही को तारे हैं'॥४०॥ मोको अति प्यारे साधु उनकी अगाध मति, कर्यो अपराध तुम सह्यो कैसे जात है। धाम धन वाम सुत प्राण तनु त्याग करें, ढरैं मेरी ओर निसि भोर मोसौँ बात है। मेरेउ न सन्त बिनु और कछु साँची कहौं, जाओ वाही ठौर जाते मिटै उतपात है। बड़ेई दयाल सदा दीन प्रतिपाल करैं न्यूनता न धरैं कहूँ भक्ति गात-गात हैं॥४१॥ ह्वै करि निरास ऋषि आयो नृप पास चल्यो, गर्व सौं उदास पग गहे दीन भाष्यो है। राजा लाज मानि मृदु कहि सनमान कर्यो, ढर्यो चक्र ओर कर जोरि अभिलाष्यो है॥ भक्त निसकाम कभूँ कामना न चाहत हैं, चाहत हैं विप्र दुख दूरि करो चाख्यो है। देखिकै विकलताई सदा सन्त सुखदाई, आई मन माँझ सब तेज ढाँक राख्यो है॥४२॥ श्रीअम्बरीषजी की छोटी रानी एक नृपसुता सुनि अम्बरीष भक्तिभाव, भयो हिये भाव ऐसो वर कर लीजिये। पिता सौं निशंक ह्वैकैं कही पति कियो मैं ही, विनय मानि मेरी वेगि चीठी लिख दीजिये!! पाती लैके चल्यो विप्र क्षिप्र वही पुरी गयो, नयो चाव जान्यो ऐपै कैसे तिया धीजिये। कहो तुम जाय रानी बैठीं सत आय मोकौं, बोल्यो न सुहाय प्रभुसेवा माँझ भीजिये॥४३॥ कह्यो नृप सुता सौं जु कीजिये यतन कौन?, पौन जिमि गयो आयो काम नाहीं बिया कौ। फेरिकै पठायो सुख पायो मैं तो जान्यौं, वह बड़ो धर्मज्ञ वाके लोभ नाहीं तिया कौ॥ बोली अकुलाय मन भक्ति ही रिझाय लियो, कियो पति मुख नहीं देखौं और पिया कौ। जायके निशंक यह बात तुम मेरी कहौ, चेरी जौ न करौ तौ पै लेवो पाप जिया कौ॥४४॥ कही विप्र जाय सुनि चाय भहराय गये, दयो लै खड्ग 'यासौं फेरा फेरि लीजियै'। भयो जू विवाह उत्साह कहूँ मात नाहिं आई पुर अम्बरीष देखि छबि भीजियै॥ कह्यो 'नव मन्दिर में झारिकै बसेरो देवो, देवो राव भोग विभौ नाना सुख कीजिये। पूरब जनम कोऊ मेरे भक्ति गन्ध हुती याते सनबन्ध पायो यहै मानि धीजियै'॥४५॥