भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 195 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 32

श्रीविदुरजी) (१६

रजनी के शेष पति भौन में प्रवेस कियो, लियो प्रेम साथ ढिग मन्दिर के आइये। बाहिरी टहल पात्र चौका करि रीझि रही, गही कौन जाय जामें होत ना लखाइये।। आवत ही राजा देखि लगै न निमेष हूँ, कौन चोर आयो मेरी सेवा लै चुराइये। देखी दिन तीनि फेरि चीन्हिकै प्रवीन कही, कि ऐसौ मन जौ पै प्रभु माथे पधराइये।।४६।। लई बात मानि मानो मन्त्र लै सुनायो कान, होत ही बिहान सेवा नीकी पधराई है। करति सिंगार फिर आपु ही निहारि रहै, लहै नहीं पार दृग झरी सी लगाई है।। भई बढ़वार राग भोग सौं अपार भाव, भक्ति विस्तार रीति पुरी सब छाई है। नृपहू सुनत अब लागि चौंप देखिवे की, आये ततकाल मति अति अकुलाई है।।४७।। हरे हरे पाँव धरैं पौरियानि मने करैं, खरे अरबरैं कब देखौं भागभरी को। गये चलि मन्दिर लौं सुन्दरी न सुधि अंग, रंग भीजि रही दृग लाइ रही झरी को।। बीन लै बजावै गावै लालन रिझावै त्यौं-त्यौं, अति मन भावै कहैं धन्य यह घरी को। द्वार पै रह्यौ न जाय गये ढिग ललचाय, भई उठि ठाढ़ि देखि राजा गुरु हरि को।।४८।। वैसे ही बजाओ बीन ताननि नवीन लैकैं, झीन सुर कान परै जाति मति खोइये। जैसे रंग भीजि रही कही सो न जात मोपै, ऐपै मन नैन चैन कैसे करि गोइये।। करिकै अलापचारी फेरिकै सँभारि तान, आइ गयो ध्यान रूप ताहि माँझ भोइये। प्रीति रसरूप भई राति सब बीति गई, नई कछु रीति अहो! जामें नहिं सोइये।।४६।। बात सुनी रानी और राजा गये नई ठौर, भई सिरमौर अब कौन वाकी सर है। हमहूँ लै सेवा करैं पति मति वश करैं, धरैं नित्य ध्यान विषय बुद्धि राखी धर है।। सुनिकै प्रसन्न भये अति अम्बरीष ईश, लागी चौंप फैलि गई भक्ति घर-घर है। बढ़ै दिन-दिन चाव ऐसोई प्रभाव कोई, पलटै सुभाव होत आनंद को भर है।।५०।।

श्रीविदुरानीजी

न्हात ही विदुर नारि अंगन पखारि करि, आइ गये द्वार कृष्ण बोलिकै सुनायो है। सुनत ही स्वर सुधि डारी लै निदरि मानो, राख्यो मद भरि दौरि आनिकै चितायो है।। डारि दियो पीत पट कटि लपटाय लियो, हियौ सकुचायो वेष वेगि ही बनायो है। बैठी ढिग आइ केरा छिलि छिलिका खवाइ, आयो पति खीझ्यो दुख कोटि गुनो पायो है।।५१।।

श्रीविदुरजी

प्रेम को विचारि आपु लागे फल सार दैन, चैन पायो हियो नारि बड़ी दुखदाई है। बोले रीझि स्याम तुम कीनो बड़ो काम ऐपै, स्वाद अभिराम वैसी वस्तु मैं न पाई है।।