भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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भूमिका सनातन धर्म की अविच्छिन्न धारा प्राचीन काल से आज तक प्रवाहित हो रही है। भगवान कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जी ने अवतार लेकर कालक्रम से धारणा शक्ति के क्षीण हो जाने पर, सौलभ्य की दृष्टि से एक वेद की चार संहितायें कीं। वेद के अंतिम भाग वेदान्त रूप उपनिषदों का अभिप्राय समझने को ब्रह्मसूत्र की रचना की, जन साधारण को वेदों का अभिप्राय समझाने तथा पुरूषार्थ चतुष्टय की सिद्धि के लिए महाभारत की रचना की। महाभारत की रचना करने पर भी उन्हें अपने अवतार प्रयोजन की सिद्धि, या कृतार्थता का अनुभव नहीं हो रहा था, तब देवर्षि नारद ने आकर श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना को प्रेरित किया। श्रीमद्भागवत की रचना करके व्यास जी को कृतार्थता या शान्ति प्राप्त हुई। वास्तव में महापुरुषों के अवतार का प्रयोजन विश्वकल्याण होता है। श्रीमद्भागवत में प्रोज्झित कैतव परम धर्म अर्थात् निष्काम प्रेमाभक्ति का वर्णन है जिसके आश्रय लेने से "सद्योहृद्यवरुद्ध्येतेत्रकृतिभिः" अर्थात् श्रवण की उत्कण्ठा मात्र से भगवान हृदय में अवरुद्ध हो जाते है। भगवत् प्राप्ति ही मानव जीवन का परम प्रयोजन है। भगवान शुकदेव निर्गुण उपासना में परिनिष्ठित थे, फिर भी वे व्यास शिष्यों से 'बर्हापीडं नटवर वपुः' श्लोक सुनकर रूपमाधुरी और "अहोबकीयं" श्लोक से भगवान की उदारता को सुनकर 'उत्तमश्लोक लीलया गृहीत चेता' भगवान वेदव्यास के पास आये और परमहंस संहिता का अध्ययन किया- हरेर्गुणाऽक्षिप्तमतिर्भगवान्बादरायणिः। अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः॥ श्रीमद्भागवत का परम प्रयोजन ब्रह्माजी ने भी नारदजी को उपदेश करते समय यही बताया है- यथा हरौ भगवते नृणां भक्तिर्भविष्यति। सर्वात्मन्यखिलाधारे इति संकल्प्य वर्णय।। अतः नारदजी ने गेहे-गेहे जने-जने भक्ति की स्थापना की प्रतिज्ञा की। स्वयं ब्रह्माजी ही उस परम् प्रयोजन की सिद्धि के लिये अवतरित हुए। बाल्मीकि जी भी उसी प्रयोजन के लिए अवतरित हुए - कलि कुटिल जीव निस्तार हित वाल्मीक तुलसी भयौ। उसी प्रयोजन से आचार्यों का अवतरण हुआ। उन्होनें उपनिषद् ब्रह्मसूत्र गीता पर अपने अपने भाष्य लिखकर अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि के द्वारा ब्रह्म जीव माया के स्वरूप का निर्वचन किया। इन आचार्यों ने अनीश्वरवादी बौद्ध और जैन के प्रभाव से पथभ्रष्ट जनता का मार्ग दर्शनकर संरक्षण किया। कालान्तर में पश्चिम से मुगलों के आक्रमणों और उनके शासन से सनातन धर्म अत्याधिक बाधित हुआ। तब करुणावरुणालय सनातन धर्म के स्वरूप भगवान ने चैतन्य महाप्रभु, श्री कबीरदास, श्री तुलसीदास, श्री सूरदास, श्री मीराबाई, श्री नाभादास आदि भक्तों को भेजकर संकटग्रस्त भारतीय जनता को अवलम्बन दिया। मुगलकाल में समाज के पथ दर्शक भी मुगलों के उत्पीड़न और प्रलोभन से प्रभावित हुये और उनके अनुसरण से जन साधारण भी प्रभावित हुआ। समाज में अनेक मनसुख सम्प्रदाय प्रगट हो गये। लोग उनका अनुसरण कर हिंसा का समर्थन करने लगे। यद् यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनाः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्त दनुवर्तते।। तत्वनिष्ठ महापुरुषों के मर्यादा उल्लंघन को जन सामान्य कैसे समझ सकता है। त्वत्पादपद्ममकरन्दजुषां मुनीनां, वर्त्मास्फुटं नृपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम् इसी प्रेमपथ के रहस्य को सोदाहरण समझाने के लिये ही श्री नाभा गोस्वामी जी द्वारा भक्तमाल का अवतरण हुआ। श्री नाभा गोस्वामी जी ने वेदों का गाभा अर्थात् सार सर्वस्व भक्तभक्ति भगवन्त गुरु चतुर नाम वपु