भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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एक के द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत से अविरुद्ध, सार्वभौम का सद्यः कल्याण कारक “भक्त भक्ति भगवन्त गुरु" के चतुष्टय का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इस प्रकार “सबहिं सुलभ सब दिन सब देशा, सेवत सादर शमन कलेशा” भक्त की उपासना रूप भागवत के परम-प्रयोजन को सिद्ध किया।

वस्तुतः भागवत भक्तमाल ही है। दोनों का प्रयोजन एक है। आपद्ग्रस्त सनातन धर्म की जैसे तुलसीदास जी ने रामचरितमानस रचकर रक्षा की उसी प्रकार से सम्प्रदायों के बहुरूपों को एकता की डोरी में बाँधकर नाभा गोस्वामी जी ने किया। भक्तमाल महद् आकाश की ज्योत्स्ना में तारागणों के बीच विराजमान पूर्णचन्द्र श्री कृष्ण चन्द्र की शोभा संसार से पाप ताप का हरण कर रही है। भारतीय संस्कृति के प्राचीन काल से आज तक के स्वरूप का दिग्दर्शन कराने वाली भक्तमाल भारतीय संस्कृति का महाकोष है। उसकी उपादेयता आज की परिस्थितियों में और अधिक बढ़ गयी हैं, क्योंकि प्राचीन काल के समर्थ महापुरुषों का अनुकरण करना आज के असमर्थ साधकों को भले ही दुरुह हो पर भक्तमाल में आधुनिक, हमारे ही समान परिस्थितियों में रहने वाले भक्तों के चरित्रों का परम प्रयोजन जीवन में सुख शान्ति लाभपूर्वक परमात्मा की प्राप्ति है जो भक्ति से ही सम्भव है। उसके गूढ़ रहस्य को बिना भक्तमाल का आश्रय लिये नहीं समझा जा सकता। बिना भक्तमाल भक्ति रूप अति दूर है। यह भक्ति के रहस्य भक्तों के चरित्र से समझे जा सकते हैं। भगवान गीता में “तदात्मानं सृजाम्यहम्" कह कर आत्मानम् पद से अपने प्यारे भक्तों का संकेत करते हैं। भगवत प्राप्ति के सम्पूर्ण साधनों में भगवद् भक्ति सर्वाधिक सरल और उत्तम साधन है और उसकी सिद्धि श्री नाभागोस्वामी रचित श्री भक्तमाल के पठन, श्रवण, मनन से ही संभव है। इसमें नवधा, दशधा, प्रेमा, परा आदि भक्ति के स्वरूपों का ज्ञान, वैराग्य, तप, त्याग, शील, सदाचार, सत्य, अहिंसा, क्षमा, दया, समानता, अमानता आदि सद्गुणों का भक्तों की रहनी, सहनी, कहनी, भगवान के प्रति उनके दिव्य भाव एवं निष्ठा का सविशेष वर्णन हुआ है। साथ ही भगवान की भक्तवत्सलता, भक्तप्रियता, दयालुता, शौशील्य और भक्त सौलभ्य आदि गुणों का अति सुन्दर वर्णन है। विशेष रूप से भक्त परत्व का युक्तियुक्त वर्णन है। अतः धार्मिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, साहित्यिक सभी दृष्टियों से श्री भक्तमाल अनूठा ग्रन्थरत्न है।

भक्तमाल के रचियता श्री नाभा जी का जन्म माघ सुदी पंचमी विक्रम संवत १५८७ के लगभग हुआ। बाल्यकाल में ही आप श्री रामानन्दाचार्य परम्परा के श्री अग्रदेवाचार्य जी महाराज के कृपाभाजन हुये। जन्मान्ध बालक नारायणदास को सर्वप्रथम गुरुदेव का ही दर्शन हुआ।

गुरुस्थान गलताजी में, गुरु आज्ञा से सन्त सेवा करते-करते, उनका उच्छिष्ट प्रसाद पाकर आपको दिव्य दृष्टि की प्राप्ति हो गयी। जिससे आप गुरुदेव की मानसी सेवा का दर्शन और भक्त के डूबते हुये जहाज को बचाने में समर्थ हुए। उसी समय श्री अग्रदेवाचार्य जी ने इन्हें समर्थ जानकर भक्तों के सुयश वर्णन करने की आज्ञा और आशीर्वाद दिया। तदनुसार आपने समाधिस्थ होकर भक्त चरित्रों का दर्शनकर भक्तमाल की रचना की। भक्तमाल समाधिवाणी है अतः इसके छप्पय में गागर में सागर भरा है। उसकी सांकेतिक भाषा को समझना सहज नहीं था। अतः श्री नाभाजी ने अपने साकेत गमन के लगभग सौ वर्ष बाद श्री प्रियादास जी को दर्शन देकर श्री भक्तमाल पर छन्दोबद्ध टीका करने की आज्ञा दी। तदनुसार आपने मनहरण कवित्त छन्दों में भक्तिरस बोधिनी नाम की टीका की, जो यथार्थ में भक्तिरस का बोध कराती है। श्री प्रियादास जी के गुरुदेव श्रीमन्मोहरदासजी महाराज थे। आप श्री राधा रमण लाल जी के प्राकट्यकर्ता श्रीमद् गोपालभट्ट जी के चरणाश्रित श्रीनिवासाचार्य जी के शिष्य थे।

श्री भक्तमाल जी की टीका के सम्बन्ध में स्वयं प्रियादासजी ने कहा है "टीका अरु भूल नाम मूल जात सुनै जब"। उन्होंने स्वयं को टीकाकार नहीं माना है “नाभा जू कहाई याते प्रौढ़ि के सुनाई है।” पुनः “नाभाजू कौ अभिलाष पूरन लै कियौ मैं तौ" वस्तुतः “टीका को चमत्कार जानौगे विचार मन" अर्थात् प्रियादास जी की भक्तिरसबोधिनी टीका अपने वैशिष्ट्य के कारण भक्तमाल का अभिन्न अंग बन गई है। अतः श्री नाभा जी के छप्पय तथा प्रियादास जी के मनहरन कवित्त दोनों को मिला कर भक्तमाल संज्ञा हुई है।