भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

पृष्ठ 6, कुल 195 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 6

श्री भक्तमाल जी के मूल में १७ दोहे एवं १९७ छप्पय कुल २१४ छन्द है। भक्तिरसबोधिनी टीका के कवित्तों की संख्या ६३४ है। कुछ विद्वानों के मत मे एकाध छन्द प्रक्षिप्त है। श्रीभक्तमाल जी का अध्ययन, अध्यापन, समाजगायन कार्य श्री अयोध्या एवं श्री वृन्दावन में विशेष रूप से होता है। श्री टोपी कुंज वृन्दावन के बाबा श्री माधवदास जी "भक्तमाली" से अधिकांश भक्तिमालियों ने अध्ययन किया है। उनमें महामहिम श्री जगन्नाथ प्रसाद जी भक्तमाली श्री भक्तमाल जी के परम मर्मज्ञ थे। वे श्री भक्तमाल जी के मूर्तिमान स्वरूप थे। श्री सुदामादास जी और श्री नारायण दास जी "मामाजी" नेहनिधि आप ही के शिष्य थे। श्री गणेशदासजी कृत भक्तवल्लभा टिप्पणी को समाहत कर आपने भक्तगाल की पाठ्यपुस्तक की संज्ञा दी। पुनः जन-जन में श्री भक्तमाल जी के प्रचार प्रसार को लक्ष्य कर संत श्री सुदामादास जी को प्रेरित कर श्री गणेशदास जी को विस्तृत टीका करने को वृन्दावन बुलाया। सद्गुरुदेव भक्तमाली कृत श्री गणेशदासजी टीका एवं श्री रामेश्वरदास रामायणी की व्याख्या से यह ग्रन्थ चार खण्डों में सम्पन्न हुआ। श्री भक्तमाल जी की रचना विक्रम संवत १६८० के लगभग गलतागादी जयपुर में हुई है। श्री प्रियादास जी ने मनहरण कवित्त छन्दों में भक्तिरसबोधिनी टीका फाल्गुन वदी सप्तमी वि. संवत १७६९ में पूर्ण की। श्री भक्तमाल पाठ का आधार श्री गणेशदास भक्तमाली संपादित भक्तवल्लभा टिप्पणी है। मूल पाठ की प्रणाली में श्री भक्तमाल के छप्पयों की अंतिम तुक आदि में पढ़ी जाती है। यह प्राचीन परम्परा है। कुछ लोग कहते हैं कि यह तो केवल गायन को ललित बनाने के लिये है, पर ऐसा नहीं है। सन्त भीखा साहब आदि प्राचीन हिन्दी कवियों ने भी छप्पयों का निर्माण इसी ढंग से किया है कि अंत के चरण को प्रथम पढ़ना अनिवार्य है। जैसे बक्ता श्रोता को आरम्भ में ही सम्बोधित करता है न कि प्रसंग समाप्ति के पश्चात् मू. छ. २६ "श्वेत द्वीप के दास जे श्रवण सुनौ तिनकी कथा" इसी प्रकार "प्रसाद अवज्ञा जान के पाणि तजौ एकै नृपति" इस चरण का सम्बन्ध है। "कथा कहौं बनाय" से है। इसी प्रकार मू. छ. ५४ 'वच्छ हरन'। मू. छ. ५१ में "आशै अगाध" का सम्बन्ध "श्री रंगनाथ" चरन से है। प्रायः अन्तिम चरण में ही भक्त का नाम और उनकी विशेषता आई है बिना उसके पढ़े क्रम नहीं बनेगा और न ही रस का आस्वादन होगा, अतः अंतिम चरण को आदि में ही पढ़ना चाहिए। पाठ भेद या संख्या भेद को लेकर जो भी विचार हो, उसे नाभा जी के उदार दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर ही समझना चाहिए न कि साम्प्रदायिक पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण से। वैसे आदि काल से मूल २१४ छन्द तथा टीका ६३२ कवित्त प्रसिद्ध है। किसी प्रति में चरण चिह्न के चार कवित्त नहीं है। किसी ने दिग्विजयी के चार कवित्त श्री चैतन्य महाप्रभु के चरित्र में रखे हैं। समीक्षा करने पर उक्त चारों कवित्त श्री केशवकाश्मीरी के चरित्र में ही उचित प्रतीत होते हैं। इसी प्रकार चरण चिह्नों के चार कवित्त छोड़ने के सम्बन्ध में कोई तर्क नहीं दिया गया है। अतः उन्हें स्थान दिया गया है। उपरोक्त समीक्षा के आधार पर श्री गणेशदास जी महाराज कृत भक्तवल्लभा टिप्पणी, जो संतों द्वारा मान्य है, उसी के पाठ का अनुसरण किया गया है। पाठ की सुविधा से सप्ताह परायण, नवाह्न परायण तथा मास परायण का भी संकेत दिया गया है। श्री भक्तमाल के समाज गायन की तथा पाठ की प्राचीन परम्परा है उसकी उपादेयता को देखते हुए भक्तों के आग्रह से श्री मूल भक्तमाल तथा श्री प्रियादास जी की कवित्तमयी टीका का प्रकाशन श्री मलूकपीठ सेवा संस्थान से किया जा रहा है। आशा है कि पाठकगण संतुष्ट होकर भक्तभक्ति की सद्भावनायें प्रेषित करेंगे। प्रार्थी राजेन्द्र दास, मलूकपीठ वृन्दावन