श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०) (श्री भक्तमाल ध्याननिष्ठ भक्त ध्यान चतुर्भुज चित धर्यो, तिन्हें शरण हौं अनुसरौं ।। अगस्त्य पुलस्त्य पुलह, च्यवन वशिष्ठ सौभरि रिषि। कर्दम अत्रि रिचीक, गर्ग गौतम सुव्यास शिषि ।। लोमश भृगु दालभ्य, अंगिरा शृंगि प्रकासी। माण्डव्य विश्वामित्र, दुर्वासा सहस अठासी ।। जाबालि यमदग्नि मायादर्श कश्यप परवत पराशर पद रज धरौं। ध्यान चतुर्भुज चित धर्यो तिन्हें शरण हौं अनुसरौं ।। १६ ।। अठारह महापुराण साधन साध्य सत्रह पुरान, फलरूपी श्रीभागवत ।। ब्रह्म विष्णु शिव लिंग, पद्म स्कन्द विस्तारा। वामन मीन वाराह अग्नि कूरम ऊदारा ।। गरुड़ नारदी भविष्य, ब्रह्मवैवर्त्त श्रवण शुचि। मार्कण्डेय ब्रह्माण्ड कथा, नाना उपजै रुचि ।। परमधर्म श्रीमुख कथित, चतुःश्लोकी निगम सत। साधन साध्य सत्रह पुरान फलरूपी श्रीभागवत ।। १७ ।। अठारह स्मृतियाँ दश आठ स्मृति जिन उच्चरी, तिन पद सरसिज भाल मो ।। मनुस्मृति अत्रेय वैष्णवी हारीतक यामी। याज्ञवल्क्य अंगिरा शनैश्चर साम्बर्तक नामी ।। कात्यायनि सांख्यल्य, गौतमी वासिष्ठी दाखी। सुरगुरु आतातापि पराशर क्रतु मुनि भाखी ।। आशा पास उदारधी, परलोक लोक साधन सो। दश आठ स्मृति जिन उच्चरी तिन पद सरसिज भाल मो ।। १८ ।।