भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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३२) (श्री भक्तमाल समस्त ब्रजवासीगण बाल वृद्ध नर नारि गोप, हौं अर्थी उन पाद रज।। नन्द गोप उपनन्द, ध्रुव धरानन्द महरि जसोदा। कीरतिदा वृषभानु, कुँअरि सहचरि मन मोदा।। मधुमंगल सुबल, सुबाहु भोज अर्जुन श्रीदामा। मण्डल ग्वल अनेक, श्याम संगी बहुनामा।। घोष निवासिन की कृपा, सुर नर बांछत आदि अज। बाल वृद्ध नर नारि गोप हौं अर्थी उन पाद रज।। २२।। श्रीकृष्णजी के षोडश सखा ब्रजराज सुवन संग सदन वन, अनुग सदा तत्पर रहें। रक्तक पत्रक और पंत्रि, सबही मन भावैं। मधुकण्ठौ मधुवर्त्त रसाल विशाल सुहावैं।। प्रेमकन्द मकरन्द, सदा आनन्द चन्द्रहासा। पयद बकुल रसंदान, सारदां बुद्धि प्रकासा।। सेवा समय विचारिकै, चारु चतुर चित की लहैं। ब्रजराज सुवन संग सदन बन अनुग सदा तत्पर रहें।। २३।। सप्तद्वीप के भक्त सप्तद्वीप में दास जे, ते मेरे सिरताज।। जम्बू और पलच्छ, सालमलि बहुत राजरिषि। कुश पवित्र पुनि क्रौंच, कौन महिमा जानै लिषि।। साक विपुल विस्तार, प्रसिध नामी अति पुहकर। पर्वत लोकालोक, ओक टापू कंचनधर।। हरिभृत्य बसत जे-जे जहाँ, तिनसौँ नित प्रति काज। सप्तद्वीप में दास जे ते मेरे सिरताज।। २४।।