श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२) (श्री भक्तमाल)
श्रीअग्रदासजी (श्री) अग्रदास हरिभजन बिन काल वृथा नहिं बित्तयो।। सदाचार ज्यौं सन्त, प्राप्त जैसें करि आये। सेवा सुमिरन सावधान, चरण राघव चित लाये।। प्रसिध बाग सौं प्रीति, सुहथ कृत करत निरन्तर। रसना निर्मल नाम, मनहुँ वर्षत धाराधर।। कृष्णदास(कृपाकरि)भक्तिदत्त, मन वच क्रम करि अटल दयो। (श्री) अग्रदास हरिभजन बिन काल वृथा नहिं बित्तयो।।४१।।
दरसन काज महाराज मानसिंह आयो, छायो बाग माँझ बैठे द्वार द्वारपाल हैं। झारिकै पतौवा गये बाहिर लै डारिवे को, देखी भीर भार रहे बैठि ये रसाल हैं।। आये देखि नाभा जू ने उठि साष्टांग करी, भरी जल आँखे चले अँसुवनि जाल हैं। राजा मग चाहि हारि आनिकै निहारै नैन, जानी आप जानी भये दासनि दयाल है।।१२३।।
श्रीशंकराचार्यजी कलियुग धर्मपालक प्रगट, आचारज शंकर सुभट।। उत्शृंखल अज्ञान, जितें अनईश्वरवादी। बौद्ध कुतर्की जैन, और पाखण्डहिं आदी।। विमुखनि को दियों, दण्ड ऐंचि सन्मारग आने। सदाचार की सीव, विश्व कीरतिहिं बखाने।। ईश्वरांश अवतार महि, मरजादा माँडी अघट। कलियुग धर्मपालक प्रगट, आचारज शंकर सुभट।।४२।।
विमुख समूह लैकें किये सनमुख श्याम, अति अभिराम लीला जग बिसतारी है। सेवरा प्रबल बास केवरा ज्यौं फैलि रहे, गहे नहीं जाहिं वादी शुचि बात धारी है।। तजिकै सरीर काहू नृप में प्रवेस कियो, दियो करि ग्रन्थ मोह–मुद्गर सुभारी है। शिष्यानि सौं कह्यो कँभू देह में आवेस जानो, तबही बखानो आय सुनि कीजै न्यारी है।।१२४।। जानिकै आवेस तन शिष्य नै प्रवेस कियो, रावले में देखि सो श्लोक लै उच्चार्यो है। सुनतहिं तज्यो तन निज तन आय लियो, कियो यों प्रमान दासपन पूरो पार्यो है।।