श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकील्हदेवजी) (४१ पयहारी के शिष्यगण पयहारी परसाद तें, शिष्य सबै भये पारकर।। कील्ह अगर केवल, चरण ब्रतहठी नारायण। सूरज पुरुषां पृथु, तिपुर हरिभक्ति परायन।। पद्मनाभ गोपाल, टेक टीला गदाधारी। देवा हेम कल्यान, गंगा गंगासम नारी।। विष्णुदास कन्हर रंगा, चाँद सबही गोविन्द पर। पयहारी परसाद तें शिष्य सबै भये पारकर।।३६।। श्रीकील्हदेवजी गांगेय मृत्यु गंज्यो नहीं, त्यौं कील्ह करन नहिं कालवश।। राम चरण चिन्तवनि, रहति निशिदिन लौं लागी। सर्वभूत सिर नामित, सूर भजनानन्द भागी।। सांख्ययोग मति सुदृढ़, कियो अनुभव हस्तामल। ब्रह्मरन्ध्र करि गौन भये, हरि तन करनी बल।। सुमेरदेव सुत जग विदित, भुवि विस्तार्यो विमल यश। गांगेय मृत्यु गंज्यो नहीं त्यौं, कील्ह करन नहिं कालवश।।४०।। श्रीसुमेर देव पिता सूबे गुजरात हुतें, भयो तनु पात सो विमान चढ़ि चले हैं। बैठे मधुपुरी कील्ह मानसिंह राजा ढिंग, देखे नभ जात उठि कही भले-भले हैं।। पूछे नृप 'बोले कासौँ?' कैसे के प्रकासौँ, कहौ, कह्यो हठ परे सुनि अचरज रले है। मानुस पठाये सुधि ल्याये साँच आँच लागी, करी साष्टांग बात मानी भाग फले हैं।।१२१।। ऐसे प्रभु लीन नहीं काल के अधीन बात, सुनिये नवीन चाहें रामसेवा कीजिये। धरी ही पिटारी फूल-माला हाथ डार्यो तहाँ, ब्याल कर काट्यो कह्यो फेरि काटि लीजिये।। ऐसे ही कटायो बार तीनि हुलसायो हियो, कियो न प्रभाव नेकु सदा रस पीजिये। करिकै समाज साधु मध्य यों विराज प्रान, तजे, दसैँ द्वार योगी थके सुनि जीजिये।।१२२।।