भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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४०) (श्री भक्तमाल श्रीरंगजी द्यौसा एक गाँव, तहाँ श्रीरंग सुनाम हुतो, बनिक सराबगी की कथा लै बखानिये। रहतो गुलाम गयो धर्मराज धाम उहाँ, भयो बड़ो दूत कही सुनु अरे बानिये।। आये बनिजारे लैन देख तूँ दिखावैं चैन, बैल शृंगमध्य पैठि मारे पहचानिये। बिनु हरिभक्ति सब जगत की यही रीति, भयो हरिभक्त श्रीअनन्तपद ध्यानिये।।११७।। सुत को दिखाई देत भूत नित सूख्यो जात, पूछें कही बात जाइ वाही ठौर सोयो है। आयो निसि मारिवे को धायो यह रोष भर्यो, देवो गति मोकों उन बोलिकै सुनायो है।। जाति को सोनार पर नारि लगि प्रेत भयौं, लयौं तेरी सरन मैं ढूँढ़ि जग पायो है। दियो चरनामृत लै कियो दिव्यरूप वाको, अति ही अनूप सुनो भक्तिभाव गायो है।।११८।। पयहारी श्रीकृष्णदासजी निर्वेद अवधि कलि कृष्णदास, अन्न परिहरि पय पान कियो।। जाके सिर कर धरयो, तासु कर तर नहिं आँड़यो। अर्प्यो पद निर्वान, शोक निर्भय करि छाँड़्यो।। तेजपुंज बल भजन, महामुनि ऊरधरेता। सेवत चरण सरोज, राय राना भुविजेता।। दहिमा वंश दिनकर उदय, सन्त कमल हिय सुख दियो। निर्वेद अवधि कलि कृष्णदास, अन्न परिहरि पय पान कियो।।३८।। जाके सिर कर धरयो ता तर न आँड़यो हाथ, दीनो बड़ो वर राजा कुल्हू को जू साखिये। परवत कन्दरा में दरसन दीयो आनि, दियो भावसाधु हरिसेवाँ अभिलाखिये।। गिरी जो जलेबी थार माँझ ते उठाई बाल, भयो हियो शाल बिन अरपित चाखिये। लै करि खड़ग ताहि मारन उपाइ कियो, जियो सन्त ओट फिरि मोल करि राखिये।।११६।। नृपसुत भक्त बड़ो अबलौं विराजमान, साधु सनमान में न दूसरो बखानिये। सन्त बधू गर्भ देखि उभै पनवारे दिये, कही अर्भ इष्ट मेरो ऐसी उर आनिये।। कोऊ भेषधारी सो व्योपारी पगदासिन को, कही कृपा करो कहा जानै और प्रानिये। ऐपै तजि देवो क्रिया देखि जग बुरो होत, जोति बहु दई दाम राम मति सानिये।।१२०।।