भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीअनन्तानन्दजी) (३६ श्रीसम्प्रदाय • श्रीरामानंद पद्धति प्रताप, अवनि अमृत ह्वै अनुसर्यौ।। देवाचारज द्वितीय, महामहिमा हरियानन्द। तस्य राघवानन्द भये, भक्तन को मानद।। पत्रावलम्ब पृथिवी करी, व काशी स्थाई। चारि वरन आश्रम, सबही को भक्ति दृढ़ाई।। तिनके रामानन्द प्रगट, विश्व मंगल जिन्ह वपु धर्यौ। श्रीरामानंद पद्धति प्रताप, अवनि अमृत ह्वै अनुसर्यौ।। ३५।। स्वामी श्रीरामानन्दाचार्यजी श्रीरामानन्द रघुनाथ ज्यौं, दृतिय सेतु जग तरन कियो।। अनन्तानन्द, कबीर, सुखा, सुरसुरा, पद्मावति नरहरि। पीपा, भावानन्द, रैदास, धना, सेन सुरसुर की घरहरि।। औरौ शिष्य प्रशिष्य, एक ते एक उजागर। जग मंगल आधार, भक्ति दशधा के आगर।। बहुत काल वपु धारिकै, प्रणत जनन कौं पार दियो। श्रीरामानन्द रघुनाथ ज्यौं दृतिय सेतु जग तरन कियो।। ३६।। श्रीअनन्तानन्दजी श्रीअनन्तानन्द पद परसिकै, लोकपाल से ते भये।। योगानन्द, गयेश, करमचन्द, अल्ह, पैहारी। सारी रामदास श्रीरंग, अवधि गुण महिमा भारी।। तिनके नरहरि उदित, मुदित मेहा मंगलतन। रघुवर यदुवर गाइ, विमल कीरति संच्यो धन।। हरिभक्ति सिन्धु बेला रचे, पानि पद्मजा सिर दये। श्रीअनन्तानन्द पद परसिकै, लोकपाल से ते भये।। ३७।। • पाठान्तर - श्रीरामानुज पद्धति प्रताप अवनि अमृत ह्वै अनुसर्यौ।