श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८) (श्री भक्तमाल देखे नभ-भूमि-द्वार ऐंहैं निरधारजन, वैकुण्ठ-निवासी पाँति ढिग ह्वै कै आइयै। इन्हें अब जान देवो जनि कछू कहो अहो ! गहो करौ हाँसी जब घर जाय खाइयै।। ११२।। आये देखि पारषद गयो गिरी भूमि सद, हद करी कृपा यह जानि निज जन को। पायौ लै प्रसाद स्वाद कहि अह्लाद भयो, नयो लयो मोद जान्यो साँचो सन्तपन को।। विदा ह्वै पधारे नभ-मग में सिधारे विप्र, देखत विचारे द्वार व्यथा भई मन को। गयौ अभिमान आनि मन्दिर मगन भये, नये दृग लाज बीनि-बीनि लेत कन को।। ११३।। पांइ लपटाय अँग धूरि में लुटाय कहैं, करौ मनभायो और दीन बहु भाख्यौ है। कही भक्तराज तुम कृपा मैं समाज पायो, गायो जो पुरानन में रूप नैन चाख्यौ है।। छाड़ो उपहास अब करो निज दास हमें, पूजै हिये आस मन अति अभिलाख्यौ है। किये परशंस मानो हंस ये परम कोऊ, ऐसे जस लाख भाँति घर-घर राख्यो है।। ११४।। श्रीपादपद्माचार्य जी (गुरु और शिष्य) श्रीमदारग उपदेश कृत, श्रवण सुनौ आख्यान शुचि।। गुरु गमन कियो परदेश, शिष्य सुरधुनी दृढ़ाई। इक मंजन इक पान, हृदय वन्दना कराई।। गुरु गंगा में प्रविशि, शिष्य को वेगि बुलायौ। विष्णुपदी भय मानि, कमल पत्रन पर धायौ।। पादपद्म ता दिन प्रगट, सब प्रसन्न मन परम रुचि। श्रीमदारग उपदेश कृत, श्रवण सुनौ आख्यान शुचि।। ३४।। देवधुनी तीर सो कुटीर बहु साधु रहैं, रहै गुरुभक्त एक न्यारो नहिं ह्वै सकै। चले प्रभु गाँव ‘जिनि तजो बलि जांव’ करौ कही दास सेवा गंगा में ही कैसें छ्वै सकै।। क्रिया सब कूप करै विष्णुपदी ध्यान धरै, रोष भरे सन्तश्रेणी भाव नहीं भ्वै सकै। आये ईश जानि दुखमानि सो बखान कियो, आनि मन जनि बात अंग कैसे ध्वै सकै।। ११५।। चले लैके न्हान संग गंग में प्रवेस कियो, रंग भरि बोले सो अँगोछा वेगि ल्याइयै। करत विचार सोच सागर न पारावर, गंगा जू प्रकट कह्यो कजन पै आइये।। चलेई अधर पग धरै सो मधुर जाइ, प्रभु हाथ दियो लियो तीर भीर छाइये। निकसत धाय चाय पग लपटाय गये, बड़ौ परताप यह निसिदिन गाइये।। ११६।।