श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीलालाचार्यजी) (३७ चार दिग्गज महन्त चतुर महन्त दिग्गज चतुर, भक्तिभूमि दाबे रहैं।। श्रुतिप्रज्ञा श्रुतिदेव, ऋषभ पुहकर इभ ऐसे। श्रुतिधामा श्रुतिउदधि, पराजित वामन जैसे।। श्रीरामानुज गुरु बन्धु, विदित जग मंगलकारी। शिवसंहिता प्रणीत, ज्ञान सनकादिक सारी।। इन्दिरा पद्धति उदारधी, सभा साखि सारंग कहैं। चतुर महन्त दिग्गज चतुर भक्तिभूमि दाबे रहैं।। ३२।। श्रीलालाचार्यजी आचारज जामात की, कथा सुनत हरि होइ रति।। कोउ मालाधारी मृतक, बह्यो सरिता में आयो। दाह कृत्य ज्यों बन्धु, न्यौति सब कुटुम्ब बुलायो।। नाक सकोचहिं विप्र, तबहिं हरिपुर जन आये। जेंवत देखे सबनि, जात काहू नहिं पाये।। लालाचारज लक्षधा, प्रचुर भई महिमा जगति। आचारज जामात की, कथा सुनत हरि होइ रति।। ३३।। आचारज को जामात बात ताकी सुनौ नीके, पायो उपदेस 'सन्त बन्धु करि मानियै'। कीजै कोटिगुनी प्रीति ऐपै न बनति रीति तातें इति करौ याते घटती न आनिये।। मालाधारी साधु तनु सरिता में बह्यो आयो, ल्यायो घर फेरिकै विमान सब जानिये। गावत बजावत लै नीर तीर दाह कियो, हियो दुख पायो सुख पायो समाधानिये।। ११०।। कियो सो महोच्छो ज्ञाति विप्रन को न्योतो दियो, लियो आये नहिं कियो शंका दुखदाइये। भये इकठौरे माया कीने सब बौरे कछु, कहैं बात औरे मरी देह बही आइये।। याते नहीं खात वाकी जानत न जाति-पाँति, बड़ौ उतपात घर ल्याइ जाइ दाहिये। मग अवलोकि उत पर्यो सुनि शोक हिये, जिये आइ पूछें गुरु कैसे कै निवाहिये।। १११।। चले श्री आचारज पै बारिज बदन देखि, करि साष्टांग बात कहि सो जनाइयै। जाओ निहशंक, वे प्रसाद को न जानैं रंक, जानैं जे प्रभाव आवैं वेगि सुखदाइयै।।