श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
पृष्ठ 51, कुल 195 में से
संदर्भ में पढ़ें३६) (श्री भक्तमाल मंगल मुनि श्रीनाथ, पुण्डरीकाक्ष परम जस। राममिश्र रसरासि, प्रगट परताप परांकुश॥ यामुन मुनि रामानुज, तिमिर हरन उदय भान। सम्प्रदायं शिरोमणि सिन्धुजा, रच्यौ भक्ति वित्त न॥ ३०॥ स्वामी श्रीरामानुजाचार्यजी सहस्त्र आस्य उपदेश करि जगत उधारन जतन कियो॥ गोपुर ह्वै आरूढ़, उच्चस्वर मन्त्र उच्चार्यो। सूते नर परे जागि, बहत्तरि श्रवणनि धार्यो॥ तितनेई गुरुदेव पधति, भई न्यारी न्यारी। कुरुतारक शिष्य प्रथम, भक्ति वपु मंगलकारी॥ कृपणपाल करुणा समुद्र, रामानुज सम नहिं बियो। सहस्त्र आस्य उपदेश करि जगत् उधारन जतन कियो॥३१॥ आस्य सो वदन नाम सहस हजार मुख, शेष अवतार जानो वही सुधि आई है। गुरु उपदेसि मन्त्र कह्यो 'नीके राख्यो' अन्त्र, जपतहिं श्याम जू ने मूरति दिखाई है॥ करुनानिधान कही 'सब भगवान पावें' चढ़ि दरवाजे सो पुकार्यो धुनि छाई है। सुनि सीखि लियो यों बहत्तरहि सिद्ध भये, नयो भक्ति चोज यह रीति लैके गाई है॥१०७॥ गये नीलाचल जगन्नाथ जू के देखिवे कौं, देख्यो अनाचार सब पण्डा दूरि किये है। संग लै हजार शिष्य रंग भरि सेवा करें, धरैं हिये भाव गूढ़ मत दरसाये हैं॥ बोले प्रभु 'वेई आवैं' करे अंगीकार मैं तो, प्यार ही को लेत कँभू औगुन न लिये है। तऊ दृढ़ कीनी फिरि कही नहीं कान दीनी, लीनी वेदवानी विधि कैसे जात छिये हैं॥१०८॥ जोरावर भक्त सौं बसाइ नहीं कही किती, रती हूँ न लावैं मन चोज दरसायौ है। गरुड़ को आज्ञा दई सोई मानि लई उन, शिष्य नि समेत निज देस छोड़ि आयौ है॥ जागिकै निहारे ठौर और ही मगन भये, दिये यों प्रगट करि गूढ़ भाव पायौ है। वेई सब सेवा करैं, श्याम मन सदा हरैं, धरें साँचो प्रेम हिये प्रभू जू दिखायौ है॥१०६॥ मास परायण पांचवा विश्राम