भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीसम्प्रदाय) (३५ अथ श्रीभक्तमाल उत्तरार्द्ध चतुःसम्प्रदायाचार्य चौबीस प्रथम हरि वपु धरे त्यौं चतुर्व्यूह कलियुग प्रगट ।। • श्रीरामानंद उदार, सुधानिधि अवनि कल्पतरु। विष्णुस्वामि बोहित्य, सिन्धु संसार पार करु ।। मध्वाचारज मेघ, भक्ति सर ऊसर भरिया । निम्बादित्य आदित्य, कुहर अज्ञान जु हरिया ।। जनम करम भागवत, धरम सम्प्रदाय थापीं अघट। चौबीस प्रथम हरि वपु धरे त्यौं चतुर्व्यूह कलियुग प्रगट ।। २८ ।। रमा पद्धति रामानंद विष्णुस्वामि त्रिपुरारी । निम्बादित्य सनकादिका मधुकर गुरु मुखचारि ।। २६ ।। श्रीनिम्बार्काचार्यजी निम्बादित्य नाम जाते भयो अभिराम कथा, आयो एक दण्डी ग्राम न्योतो करि आये हैं। पाक को अबार भई सन्ध्या मानि लई जती, 'रतीहूँ न पाऊँ' वेद वचन सुनाये हैं।। आँगन में नींब तापै आदित दिखायौ ताहि, भोजन करायो पाछे निसि चिह्न पाये हैं। प्रगट प्रभाव देखि जान्यो भक्तिभाव जग, दाँव पाइ नाव पर्यो हर्यो मन गाये हैं।। १०६ ।। श्रीसम्प्रदाय सम्प्रदाय शिरोमणि सिन्धुजा, रच्यौ भक्ति वित्तान ।। विष्वक्सेन मुनिवर्य, सु पुनि सठकोप पुनीता। वोपदेव भागवत, लुप्त उधर्यो नवनीता ।। • पाठान्तर - श्रीरामानुज उदार सुधानिधि अवनि कल्पतरु।