श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४) (श्री भक्तमाल कौन वह बेर ? जेहि बेर दिन फेर होय, फेर-फेर कहैं वह बेर नहीं आइये? । आई वह बेर लै कराही माँझ हेरि दूध, डार्यो युग सेर मन नीके कै बनाइये।। चोपनि के ढेर लागि निपट औसेर दृग, आयो नीर घेरि जिनि गिरैं घूँटि जाइये। माता कहै टेरि 'करी बड़ी तैं अबेर अब, करो मति झेर' अजू चित दै औंटाइये।।१३०।। चल्यो प्रभु पास लै कटोरा छबिरास तामें, दूध सो सुबास मध्य मिसिरी मिलाइयै। हिये में हुलास निज अज्ञता को त्रास, ऐपै करें जोपै दास मोहि महा सुखदाइयै।। देख्यौ मृदुहास कोटि चाँदनी की भास कियौ, भाव को प्रकास मति अति सरसाइयै। प्याइवे की आस करि ओट कछु भर्यो स्वास, देखिकै निरास कह्यो पीवौ जू अघाइयै।।१३१।। ऐसैं दिन बीते दोय राखी हिये बात गोय, रह्यो निसि सोय ऐपैं नींद नहीं आवही। भयो जू सवारो फिरि वैसे ही सुधार लियौ, हियौ कियौ गाढ़ौ जाय धर्यौ पियो भावही।। बार-बार पीवो कहूँ अब तुम पीवो नाहिं, आवै भोर नाना गरे छूरी दै दिखावहीँ। गहि लीयो 'कर जिनि कर ऐसी पीवौं मैं तो', पीवे कौ लगेई नेकु राखौ सदा पावही।।१३२।। आये वामदेव पाछैं पूछैं नामदेव जू सौं, दूध को प्रसंग अति रंग भरि भाखियै। मोसों न पिछाँनि दिन दोय हानि भई तब, मानि डर प्रान तज्यो चाहौं अभिलाषियै।। पीयो सुख दीयो जब नेकु राखि लीयो मैं तो, जीयो सुनि बातें कही प्यायो कौन साखियै। धर्यौ पै न पीयैं, अर्यो, प्यायौ सुख पायो नाना, यामें लै दिखायौ भक्तवश रस चाखियै।।१३३।। नृप सो मलेच्छ बोलि कही 'मिले साहिब को, दीजिये मिलाय करामात दिखराइयै'। होय करामात तोपै काहे को कसब करैं?, भरैं दिन ऐसैं बाँटि सन्तन सौं खाइयै।। ताही के प्रताप आप इहाँ लौं बुलायो हमें, दीजिये जिवाय गाय घर चलि जाइयै। दई लै जिवाय गाय सहज सुभाय ही मैं, अति सुख पाय पाँय पर्यो मन भाइयै।।१३४।। 'लेवो देस गाँव जाते मेरो कछु नांव होय', 'चाहिये न कछु' दई सेज मनिमई है। धरि लई सीस 'देऊँ संग दस बीस नर,' नाहीं करि आये जल माँझ डारि दई है।। भूप सुनि चौंकि पर्यो ल्यावो फेरि आये, कहौ कही नेकु आनिकै दिखावो कीजै नई है। जल तैं निकालि बहु भाँति गहि डारी तट, लीजिये पिछानि देखि सुधि-बुधि गई है।।१३५।। आनि पर्यो पाँय प्रभु पांश तें बचाय लीजै, 'कीजै एक बात कभूँ साधु न दुखाइये'। लई यही मानि 'फेरि कीजियै न सुंधि मेरी', लीजियै गुननि गाय मन्दिर लौं जाइये।। देखि द्वार भीर पगदासी कटि बाँधी धरि, कर सौं उछीर करि चाहै पद गाइये। देखि लीनी वेई काहू दीनी पाँच सात चोट, कीनी धक्काधकी रिस मन में न आइयै।।१३६।।