श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीनामदेवजी) (४५ बैठे पिछवारे जाइ कीनी जू उचित यह, लीनी जो लगाइ चोट मेरे मन भाइयै। कान दै कैं सुनो अब चाहत न और कछु, ठौर मोकौं यही नित नेम पद गाइयै॥ सुनत ही आनि करि करुना विकल भये, फेर्यो द्वार इतै गहि मन्दिर फिराइयै। जेतिक वे सोती मोती आब-सी उतरि गई, भई हिये प्रीति गहे पाँव सुखदाइयै॥१३७॥ औचक ही घर माँझ साँझ ही अगिनि लागी, बड़ो अनुरागी राहि गई सोऊ डारियै। कहै अहो नाथ! सब कीजिये जु अंगीकार, हँसे सुकुमार हरि मोही कौं निहारियै॥ तुम्हरौ भवन और सकै कौन आइ इहाँ?, भये यों प्रसन्न छानि छाई आप सारियै। पूछैं आनि लोग कौने छाई हो? छबाइ दीजै, लीजै जोई भावै 'तन-मन-प्रान वारियै'॥१३८॥ सुनौ और परचै जो आये न कवित्त माँझ, बाँझ भई माता क्यौं न? जौ न मति पागी है। हुतो एक शाह तुलादान को उछाह भयो, दयो पुर सबै रह्यो नामदेव रागी है॥ 'ल्यावौ जू बुलाइ' एक दोई तो फिराइ दिये, तीसरे सौं आये 'कहा कहो? बड़भागी है'। 'कीजिये जु कछु अंगीकार मेरो भलो होय', 'भयो भलो तेरो दीजै जोपै आसा लागी है'॥१३९॥ जाके तुलसी हैं ऐसे तुलसी के पत्र माँझ, लिख्यो आधो राम-नाम यासौँ तोल दीजियै। कहा परिहास करो? ढरो ह्वै दयाल देखि, होत कैसो ख्याल याकौं पूरो करो रीझियै॥ ल्यायो एक काँटो लै चढ़ायो पात सोना संग, 'भयो' बड़ो रंग सम होत नाहिं छीजियै। लई सो तराजू जासौँ तुलै मन पाँच सात, जाति-पाँतिहू को धन धर्यो पै न धीजियै॥१४०॥ पर्यो सोच भारी दुख पावें नर-नारी, नामदेव जू विचारी एक और काम कीजिये। जिते व्रत दान और स्नान किये तीरथ में, करियै संकल्प यापै जल डारि दीजिये॥ करेऊ उपाय पात पला भूमि गाढ़े पाँय, रहे वे खिसाय कह्यो इतनोई लीजियै। लैवैं कहाँ धरैं? सरवरहू न करें भक्तिभाव सौं लै भरैं हिये मति अति भीजिये॥१४१॥ कियो रूप ब्राह्मन कौं दूबरो निपट अंग, भयो हिये रंग व्रत परिचै को लीजियै। भई एकादशी अन्न माँगत बहुत भूखो, आजु तो न दैहौं भोर चाहौ जितो लीजिये॥ कर्यो हठ भारी मिलि दोऊ ताको शोर पर्यो, समझवै नामदेव याको कहा खीझिये। बीते जाम चारि मरि रहे यों पसारि पाँव, भाव पै न जानैं दई हत्या नहीं छीजिये॥१४२। रचिकै चिता कौं विप्र गोद लैके बैठे जाइ, दियो मुसुकाय मैं परीच्छा लीनी तेरी है। देखि सो सचाई सुखदाई मनभाई मेरे, भये अन्तर्धान परे पाँय प्रीति हेरी है॥ जागरन माँझ हरि भक्तन को प्यास लगी, गये लैन जल प्रेत आनि कीनी फेरी है। फेंट तें निकांसी ताल गायो पद ततकाल, बड़ई कृपाल रूप धर्यो छबि ढेरी है॥१४३॥ मास परायण छठवाँ विश्राम